• २०८१ श्रावाण ३ बिहीबार

प्रेम की इकाई

दिव्या श्री

दिव्या श्री

पैदल चलते हुए
पाँव से अधिक भारी होता है मन
ज्यों मस्तिष्क के सारे सवाल
जूते की नोक से रगड़ खाते हों
मौसम जब उदास होता है
तुम्हारी याद उदासी को दोगुना करती है
अकेले रहने को अभिशप्त
तुम्हें ढूँढ़ें भी तो कहाँ
बारिश के मौसम में
तुम बूँद-दर-बूँद रूह में उतरते हो
वसंत में तुम कली बनकर
मन की ड्योढ़ी पर खिलते हो
दुःख के मौसम में तुम उतने ही हरे रहते हो
जितने गर्मी के दिनों में कैक्टस
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने अपने पालतू कुत्ते से प्रेम किया
यक़ीन मानो उसकी वफ़ादारी के सामने
लज्जित हैं हम
तुम्हें चूमने के इल्ज़ाम में
अपने होंठों को कितना तपाया है मैंने
सच पूछो विरह के आँसू के सामने
फीका है यह गर्मी में बहता पसीना
अब तुमसे प्रेम नहीं करती कहती रही
इन शब्दों में भी प्रेम था
मुझे अफ़सोस है मेरे प्रेम का वज़न शब्दों से तौला गया
प्रेम की इकाई शब्द नहीं, दुःख है।


दिव्या श्री
बेगूसराय, बिहार, भारत