• २०८१ असार १२ मङ्गलबार

अस्तित्व या आत्मा

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

मिला करो ना !
कुछ लम्हों की दौलत लेकर
अपनेपन की बाँह पसारे
छोड कर रूढिवाद
नवयुग का आगाज करेंगे,
मिला करो ना !

जीवन का संगीत सुनाती
कल–कल बहती नदी किनारे
मखमल जैसी हरी दूब पर
दौड लगायें, मन बहलायें,
कभी बैठ कर, कभी लेटकर,
धारा का मृदु गान सुनेंगे,
मिला करो ना !

कहीं किसी तरुवर के पिछे
जिसमें अपना प्रेम कुँवारा
आलिंगनबद्ध हो जाता था
भूल जगत के सब नियमों को
दोनों मनमानी करते थे
आँख बन्द कर, बिन वाणी ही
द्रवित दिलों के भाव बहेंगे
मिला करो ना !

वातारण सुगन्धित करती
जहाँ खिली हैं कोमल कलियाँ
तन–मन को खुशियों से भरती
आमन्त्रण के पत्र थाम कर
उस सुन्दर बगिया के अन्दर
राग बसन्ती सुना रही है
हम कुछ पल सुनने बैठेंगें
मिला करो ना !

बार बार मुझको तडपाता
वह पुराना वादा तेरा
याद यकीकन तुझको होगा
भुला न देना, पछताओगे
सिर अपनी गोद में लेकर
मेरे बालों से खेलोगी
जग की सब दुविधा भूलेंगे
मिला करो ना ।।

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)