• २०८० असोज ७ आइतबार

पहाड़ और मैं

प्रतिनव पराशर

प्रतिनव पराशर

पहाड़ और मैं, बातें कर रहे थे,
उसका कहना कुछ और था तुम्हारे बारे में और मैं तर्क कर रहाथा;
तुम्हारे होने ना होने में सिर्फ अकेला बैठा फर्क कर रहाथा ।
तुमहो, नहीं हो, अभी हो, या कल थे,
कोई गुंजाइश होती भी तो कैसे होती,
तुम थे, नहीं थे, अभी थे या कल हो,
इसकी आज़माइश भी कैसे होती ।

तुम्हारा यूं रूठ कर चले जाना भी ना समझ आया,
तुम्हारा हर बार वापस आना भी ना समझ आया,
तुम कश्ती दूर की थी, या किनारा थी मेरा
ये बातें ना खुद समझी, ना समझ आया ।

ये देखो कैसी बातें कर रहे हैं ज़माने वाले,
सच ठुकरा कर यूं, झूठ को आज़माने वाले,
किस फितरत से कहेंगे के हो जाऊं बर्बाद मैं,
ये नस्लही है झूठे फसाने वाले ।

तुम आना, फिर एक बार कैद करने के इरादे से,
दूर दुनिया के झंझट, मसला – ए – ज़माने से,
छोड़आना इस बार, ये जाने कीजल्दी,
फिर हम तुम होंगे, और होगा ये फासला, ज़माने से ।।


प्रतिनव पराशर, भागलपुर बिहार