• २०८१ श्रावाण ४ शुक्रबार

आ जाया कर

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

कभी–कभी तो आ जाया कर
भोले बचपन,
प्यारे और सलोने बचपन
माँ–बापू, दीदी का बचपन
अल्हड, चंचल, नटखट बचपन
कभी–भी तो आ जाया कर

कब आया, कब चला गया तू
आ फिर से हम नाचें गायें,
बिना काम हम दौड लगायें
आ जा फिर फिसलेंगे बचपन
कभी–कभी तो आ जाया कर ।

बना गया है एक युवक भी
प्रेम दीवाना या मस्तान
स्कूल, काँलेज मस्ती के दिन
आवारा, यायावर जीवन
लक्ष्यहीन क्षण प्रेम–प्रीत के,
छुपछुप गुपचुप मिलना–जुलना
नवल प्रीत का ज्वार जगाकर
प्रथम प्रेम के किसलय बचपन
कभी–कभी तो आ जाया कर ।

आजा जल्दी, भूले प्रियवर
फिर मिलवा दे या दिखला दे
बगिया की झाडी में दुबके
नवल नेह के वो नाजुक पल
कवित कोश के एज्ज्वल बचपन
कभी–कभी तो आ जाया कर ।

युगल गीत–गायन की घडियाँ
फूलों पर मँडराती कलियाँ
भँवरों से बतियाती तितलियाँ
तेरा घर वो तेरी गलियाँ
पावन, पाक परिमल बचपन
कभी–कभी तो आ जाया कर ।

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)