• २०८१ श्रावाण ३ बिहीबार

अटूट कवच

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

प्रिये, तुमने तो मुझे असमंजस में डाल दिया
क्या उत्तर दूँ तुम्हारे प्रेम संदेश का ?
भावनाओं को शब्दों में ढालना,
उडते बादलों को डोरी से बांधना, इतना आसान तो नहीं  !

जान सको तो इतना जान लो– तुम बिन दिल कहीं लगता नहीं
एक जगह ठहरता नहीं, बहता रहता है झरने सा,
उडता फिरता है भौंरे  सा, कभी इधर कभी उधर ।

तुमसे मिलकर ऐसे बदली दुनिया मेरी
जैसे बुझे दीये में आ जाए रोशनी
रह–रह कर दिल में उठती है लेहर सी
पल–पल बढती जाती है धडकनों की गति

ऐसा डूबा हूँ प्रेम रस में कुछ भी नहीं रहा मेरे बस में
सच मानो, मेरा संपूर्ण अस्तित्व, अब है तुम्हारे वश में
आशाएं यूँ दे रहीं हैं इच्छाओं को आकार,
मानो तुम्हें पाने का सपना हो रहा है साकार !

निराशा का साया छट गया, आवरण हट गया
झाँकने लगी है, चाँदनी सी, यादों के जालों से ।
खुल गई किताब दिल की जिसपर जमी थी गर्द सालों से ।

किसी ने क्या खूब कहा है–मंजिल तक पहुंचना
आसान हो जाता है जब कोई हमसफर साथ है !

सच मानो ! आज मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि मुझे मिल गया है
अविखंडित, अटूट कवच तुम्हारे प्रेम का,
तुम्हारे बंधन का, तुम्हारे विश्वास का !

साभार: चाहतों के साये मेंं


[email protected]
(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)