English Poem
ज़िंदगी का सलीका निभाना पड़ा
गम थे गहरे मगर मुस्कुराना पड़ा
हौसलों को संभाले रहे उम्र भर
वक्त का साथ कुछ यूं निभाना पड़ा
कौन अपना यहां औ पराया यहां
जानने के लिए आजमाना पड़ा
हो गलतफहमियों का न मंजर खड़ा
आईना सच का सबको दिखाना पड़ा
जिंदगी थी किराए का घर दोस्तों
छोड़कर एक दिन हमको जाना पड़ा
आंख खुल जाए सब की सही वक्त पर
खुद को ’रश्मि’ तमाशा बनाना पड़ा
डा. रश्मि दुबे, गाजियाबाद