• २०८१ असार २८ बिहीबार

हमारी कहानी

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

तुम्हारी चेहेरे पर छाई बदलियाँ मेरी धूप को ढक लेतीं हैं
जब छटतीं हैं बदलियाँ मेरा मन चमक उठता हैं !
अब तक मुझे होता है सुख का आभास
करता है ईश्वर तुम्हारे दिल में वास !

दुःखो की पराकाष्ठा चाहे सुनामी ही क्यों ना हो
उससे सामना करके भी मैं फूलों की तरह खिल सकता हूँ
शर्त बस यही है कि तुम्हारे चेहेरे पर हमेशा रहे मधुमास !

गोधूलि की धूप भी प्यारी लगती है मुझे
शर्त एक ही है कि हो उसमें तुम्हारी निर्दोष किरणों की लाली
मुझे उतना ही अच्छा लगता है
जब तुम मुझे देती हो दिल से गाली ।

अलग ही हमारा गणितीय सुख
माइनस–माइनस दुखों को जोडकर
हम खुसी के क्षितिज बनाते हैं
प्लस–प्लस खुशियाँ समेटकर
हर्ष के सागर फैलाते हैं !

जब तुम पर पडती हैं मेरी नजरें
तुम ‘मैं’ बन जाती हो, मैं ‘तुम’ बन जाता हूँ
तुम्हारे स्पर्श की एक बून्द से मैं सागर सा हो जाता हूँ ।

मेरे चेहेरे के सारे भाव तुम्हारे प्रेम की पाण्डुलिपी हैं !
अव्यक्त लेकिन कभी न मिटने वाले
मैं और तुम एक ऐसी कहानी
दुनिया के तमाम संस्कार, संस्कृति और सभ्यताएं
इसी कहानी की व्यथा हैं ।

साभार: चाहतों के साये मेंं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)


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