• २०८१ श्रावाण ५ शनिवार

जाने क्यों ?

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

एक युग बीत गया
तुम्हारे प्रेम की छाँव में रहते–रहते
पर मुझे राहत नहीं मिली
रूप का चंदन
प्रेम आलिगंन
वचन, बन्धन
सभी कुछ है फिर भी
मेरी तडप कम नहीं होती, जाने क्यों ?

तुम्हारी निःश्छल मुस्कानों में
बस जाना चाहा था खुशियाँ ढूँढी थी
पर पता नहीं तुम उदास हो या मैं खुद गमों का दरिया हूँ
मैं मुस्कुरा न सका, चेहरा मेरा खिल न सका !

ताल मिलाते तुम्हारे प्रेम की चाल में
बहुत चलना चाहा पर पता नहीं
तुम बोझिल हो या मैं खुद गतिहीन हूँ
कदम मेरे बढ ही न सके !

तुम्हारें आगोश में कैद होकर
जी भरके रोना चाहता हूँ
पर पता महीं तुम कोई मूरत हो या मैं खुद कोई पत्थर हूँ
मेरे आँसू मोती नहीं कन सके !

मैंने लाख चाहा कि तुम्हारी ही नजरों से मैं स्वर्ग देखूँ
पर पता नहीं
यह तुम्हारी हाँखों की झपक है या मेरी खुद की नजर का दोष
मेरी आँखें खुद को ही न देख सकी, जाने क्यों ?

साभार: चाहतों के साये में


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार है ।)