• २०८१ असार २ शनिवार

शक

वंदना शुक्ल

वंदना शुक्ल

ऐसा नहीं है कि इससे पहले मैंने रेलगाड़ीके इसकूपे में यात्रा नहीं की । पहलीबार फर्स्ट क्लासमें यात्रा करना अजीब-सा लगा था । बंद-बंद सा । नखिड़कीसे बाहर झांक सको, न चायवालोंका होहल्ला, नखुली हवा । बस बंद कमरेमें तीन अनजान यात्रियोंके साथ आभिजात्य बने बैठे रहो ।

‘अनजान’ …तो कहानी यहीं से शुरू होती है । इन दिनों सांप्रदायिक दंगोंके समाचार से लोग भयभीत थे । दोनों तरफ आग लगी हुई थी । दोनों तरफ लोग डरे हुए थे । नेताओं की बयानबाजी आगमें घी का काम कर रही थी । अफवाहोंका बाजार गर्म था । तनाव तो कुछ हिस्सोंमें था, लेकिन असर पूरे देशमें था । यात्रा अर्जेंट थी, टालना मुमकिन नहीं था । चाहती तो ‘तत्काल’ सुविधाका लाभभी ले सकती थी, लेकिन सुरक्षाका सोचकर रेलके फर्स्ट क्लासकी टिकिट बुक कराली । एक ही बर्थ खाली थी ।

मेरी रेलयात्राका समय रातभरका था । मैं समय पर स्टेशन पहुंच गई । गाड़ी भी अपने नियत समयपर आकर स्टेशन पर खड़ी हो गई । जब कुली मेरा सामान फर्स्ट क्लासके कूपेमें मेरी बर्थ पर रखकर गया तब मेरे अलावा उसमें कोई यात्री नहीं था । रातमें कूपा अंदरसे बंद करना अनिवार्य है । नकरो तो अटेंडेंट आकर बंद करवा देता है… कारण सिक्युरिटी । खैर लोअर बर्थके नीचेमैं अपना लगेज रखकर पैर ऊपर कर आरामसे बैठ गई । पर्ससे किताब निकाल कर रखली और खिड़कीका परदा थोड़ा सरकाकर कांचमें से बाहर देखने लगी । अभी कुछही मिनिट बीतेथे कि एक बुर्केवाली औरत और उसके साथ दो पठानी सूट पहने लंबतडंग मर्द कूपेमें आए और टिकिटसे अपनी बर्थ नंबरका मिलान करने लगे । निश्चिंत होने पर उन्होंने अपना लगेज दूसरी लोअर बर्थके नीचे रखा और एक मर्दने लड़कीसे कहा, ‘शाजिया, तुम ऊपरकी बर्थपर चले जाना । इस अपर बर्थ पर नजीब आजाएगा और मैं यहीं नीचेकी बर्थपर लेट जाऊंगा ।’

‘जी’ …लड़कीने शायस्तगीसे जवाब दिया । अब लड़कीने अपना बुर्का उतार दिया था, सिर्फ दुपट्टा सरसे लपेट रखाथा । वे तीनों मेरे सामने वाली लोअर बर्थ पर बैठ गए । गाड़ी चलने पर उन्होंने खाना निकाला और खाते हुए धीरे-धीरे बातें करने लगे । बीच-बीचमें वह लड़की मेरी ओर देखती । मुझे लगा कि बातें करते समय मर्दोंने भी मुझे कनखियों से देखा था ।
बीचमें दो बार उस आदमीने नीचे रखे बैगको खोलकर उसमें से कुछ निकाल कर अन्य दोनों साथियोंको दिखाया । उनमेंसे एक आदमी बाहर चला गया । कुछदेरमें वह लौटा और उसने दूसरे आदमीसे कुछ बात की । फिर लड़कीने बुर्का पहना और पहले आदमीके साथ चली गई । अब वहां एक आदमी बचा था ।

‘भाई जान, अंदरसे बंद कर लेना’ जाते जाते वह कह गया । आधी रातका वक्त, रेलके बाहर घटाटोप अंधेरा, रेलकी धड़-धड़ आवाजके शोरमें सबकुछ शांत, बंद कूपा, उसमें एक अनजान वह भी दूसरे कौमका मर्द, मेरा दिमाग अबतक लगभग सुन्न हो गया । शककी सुई तेजीसे घूमने लगी । दिमागमें सैकड़ों सवाल उग आए ।आदमी अब मोबाइलपर बातें कर रहा था ।‘हां अर्जेंसी है, तुम वहां पूरा इंतज़ाम रखना, हमलोग समय पर पहुंच जाएंगे । देखो, देरीसे मुश्किलें बढ़ जाएंगी । वक्त पर सब होना चाहिए ।’ वाक्योंके ये टुकड़े मेरे कानों तक आ रहेथे, जिन्हें मैं जोड़कर पूरा करने और समझनेकी कोशिश कर रही थी । किस इंतजामकी बात कर रहा था यह आदमी ? कहीं कोई वारदात तो नहीं करने जा रहे ये लोग ? पहले तो नक्सलवादियोंके कुछ खास इलाके थे, लेकिन अब तो पूरे देशमें ही …।किसके मनमें क्या है, कौन कब क्या करदे, कोई भरोसा नहीं । क्या जरूरत थी नागरिकता कानूनका शगूफा छोड़ने की ? देशमें वैसे ही कम जनसंख्या और गरीबी है क्याकि दूसरे देशों से नागरिकोंको न्योत रहे हैं ? हर नई सरकार कोई न कोई खुराफाती कदम जरूर उठाती है । भुगतने तो आम जनताको ही पड़ते हैं न । दिमागमें सैकड़ों आशंकाएं सर उठाने लगी थीं ।

अचानक मैं उठी । मैंने चप्पल पहनी और दरवाजा खोलकर बाहर आ गई ।रातके वक्त फर्स्ट क्लासकी बोगी डरावनी-सी लगती है । सब अपने-अपने केबिनमें एसी में सो जाते हैं और केबिनके बाहर एक संकरेसे लंबे सुनसान कॉरीडोरमें रोशनीके बावजूद रहस्य फैला रहता है । मैं वाशरूम की तरफ गई । सोचा था, वे दोनों लड़की और मर्द चलती रेलगाड़ीमें वाशरूमके अलावा और कहां जा सकते हैं । लेकिन वे मुझे यहां भी नहीं दिखे ।संदेह और बढ़ने लगा । ‘यदि यहां भी नहीं तो फिर कहां ।’ मैं कुछदेर वहीं खड़ी रही । मनमें आया अटेंडेंटको कहूं कि मेरा केबिन बदल दो ।लेकिन यहांसे वहां तक बस सन्नाटा पसरा था । कोफ्त हुई कि टीसीसे ही बर्थ क्यूं नहीं बदलवा लिया । कोई दिखाई दे तब तो कहूं ? सब घोड़े बेचकर सो रहे हैं बिंदास ।

मैंने कॉरीडोरके दाहिनी तरफकी सुंदर परदे लगी खिड़कीके परदेको बेवजह थोड़ा सरकाया, ये जानते हुए कि इस कूपेमें खिड़कियोंमें कांच जड़े रहते हैं । निराश होकर एकबार पूरी बंद बोगीमें चक्कर लगाया । कहीं कोई आवाज नहीं । सब केबिनके दरवाजे पर्दों सहित मुंदे हुए । ट्रेन सरपट दौड़े जारही थी । निराश होकर ‘अब जो होगा देखा जाएगा’ सोचकर अपने केबिनके सामने आई । केबिनका दरवाजा यूं ही भेड़कर गई थी, लेकिन ये क्या, ये तो जोर से धकियानेके बावजूद नहीं खुल रहा था । मैंने जोर-जोर से दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया । मैं घबरा गई ।जब मैं खुला छोड़कर गई थी तो भीतरसे बंद क्यों कर दिया ? किसने ? अंदर तो वह आदमी… जोरकी खटखटाहट सुनकर एक लड़का आंखें मीड़ता हुआ आया ‘क्या हुआ मैडम’ उसने पूछा ।

‘आप कौन ?’ मैंने बाहरसे कुछ सख्त होते हुए कहा, लेकिन भीतरसे मेरी क्या स्थिति थी मैं ही जानती थी । ‘मैं इस बोगीका अटेंडेंट हूँ ।’ उसने सुस्तीसे कहा । ‘तुम लोगोंको यहां रेलवेने क्यों रखा हुआ है ? सोनेके लिए ? यहां पैसेंजर परेशान हो रहे हैं और तुम…’ मैं जैसे फटपड़ी । ‘उपदेश देकर टाइम बरबाद मत करिए । काम बताइये ।’ उसके चेहरे पर यही भाव था, लेकिन उसने बस इतना कहा ‘मैडम झपकी लग गई थी… क्या हुआ ?’

‘हुआ क्या…दरवाजा यूं ही भेड़कर गई थी और अब ये खुल नहीं रहा और ट्रेनकी आवाज इतनी जोरकी है कि अंदरभी सुनाई नहीं दे रहा शायद’ …मैंने रुआंसी होकर कहा । ‘हां मैडम…अंदर लोग सो रहे होंगे न …कांचमें से आवाज नहीं जाती भीतर’, उसने कहा । तबतक मेरे केबिनका दरवाजा भी खुला और वही लंबा चौड़ा आदमी सामने खड़ा था । उसे देखकर एकबार फिर मैं डर गई । ‘क्या हुआ ?’ उसने मुझसे नपूछकर अटेंडेंटसे पूछा । ‘सर, इस केबिनके दरवाजेकी अंदरकी चटखनी खराब हो गई है, अपने आप बंद हो जाती है । मैडम वाशरूम गई थीं, लौटीं तो यह बंद हो गया होगा । मेरी असलमें नींद लग गई थी ।’ अटेंडेंट लड़का सफाई दे रहा था ।

‘हद करते हो तुम लोग ।आधीरातका वक्त है यहां पेसेंजर परेशान हो रहे हैं और तुम सो रहे हो ?’ उस अनजान सहयात्रीने अटेंडेंटको फटकारा, फिर मेरी ओर मुखातिब होते हुए बोला, ‘मोहतरमा, वो वाशरूमके पास कम्प्लेंट नंबर लिखा है । आप फोन करिए …अच्छा आप रुकिए मैं करता हूँ । …मजाक बनाकर रखा है इन लोगों ने रेलवेको ।’ कहकर वह जाने लगा । ‘सॉरी सर …मैं चटखनी कलही बदलवा दूंगा ।’ लड़का गिड़गिड़ा रहा था ।
‘रहने दीजिए …अब तो सॉल्व हो गया’ …मैंने उस आदमीसे कहा । ‘आप आरामसे सोइए ।मैं भोपालमें आपको उठा दूंगा और आपका लगेजभी उतरवा दूंगा ।’ अटेंडेंट लड़केकी आवाज अब भी डरी हुई थी ।

‘ठीक है’, मैंने कहा और केबिनके भीतर आ गई । अबतक वह लंबतड़ंग सहयात्री केबिनमें जाकर बैठ गया था और मोबाइलमें कुछ देखरहा था । मोबाइलकी ओर देखते हुए उसने कहा, ‘गेट अब बंद मत करिए …खुला रहने दीजिए …टाइम होनेवाला है ।’ ‘जी…, थैंक्यू सो मच’, मैंने उससे कहा । ‘इट्स ओके’, …उसने कहा ‘भोपालमें गाड़ी पांच बजे पहुंचती है ।आप अकेली हैं । कुछदेर स्टेशन पर रुक सकती हैं ।थोड़ा उजाला होने पर चले जाइएगा’ उसने मशविरा दिया ।
‘वह मेरी बीवी है । उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है । साथमें मेरा छोटा भाई था ।हम लोग भोपालमें दिखाने जा रहे हैं । दरअसल मेरी वाइफको यहां घुटन-सी हो रही थी, तो वह दूसरी बोगीमें शिफ्ट हो गई । वह खाली थी ।वहां खिड़की खोल सकते हैं न, इसलिए उसे वहां भेज दिया । वैसेभी उसे एसी बर्दाश्त नहीं होता ।’ ‘ओह वेरी सैड…’ मेरे मुंहसे निकला ।अब वह खामोशीसे बैठा कुछ सोच रहा था ।
स्टेशनपर उतरने के बाद मैंने उससे कहा, ‘आपकी वाइफके लिए ईश्वरसे प्रे करूंगी । आपका शुक्रिया ।’ उसने फीकी मुस्कराहटके साथ मुझे देखा, जैसे पूछ रहा हो, ‘शुक्रिया तो आप दे चुकी थीं, अब किस बातका ?’
मैं मुस्करा दी ‘खुदाका शुक्रिया…।’ शुक्र है कि रातभरकी इस यात्रामें उसने तमाम शक शुबहों पर गिरह लगा दी वरना…।
साभार : वागर्थ


(ए-3-एस, सोसायटी, वरासिया रिंगरोड, वडोदरा, गुजरात–390006, मो. 9928831511)