• २०८० चैत ३० शुक्रबार

सासू माँ

इन्दु तोदी

इन्दु तोदी

मेरी भी और बहूआं की जियां एक आम धारणा थी, सासूआं सदा ई सासूआं ही होया करै , कदै भी माँ कोनी बण सकै । य ई धारणा माय भिजकर शायद म भी अपणी सासू कै भितर कदै भी माँ खोजनै की चेष्ठा ई कोनी करी, खोजती तो शायद मिल जाती की ! सासू बोलनै सै तो बहू नै भोत काम लगानै आककी, तिरस्कार करनै आककी, धमकानै आककी अर परै परै राखनै आककी ही होया करै, ऐयां की धारणा मन म घर कर चुकी थी । यही सोच सैं ग्रसित होनै कै कारणै ही शायद म उणा कै कदै काऊ का खिजनै नै भी भोत गम्भीरता सै ले लिया करती और उन्हा कै सनेह माय भी उन्हा को कोई स्वारथ छिप्यो होनै की शंका करती । इसा इ भरम इ भरम माय पड़कर म आप ही आप उन्हा सै भोत दूर दूर भागणै लागगी थी। फेर्यूं एकदिन इसो भी आयो की म आप कै मोट्यार अर टाबरां नै लेकर अलग घर बासो कर लियो ।
एक दिन की बात है म कपड़ा सुकावै थी जद चक्कर खाकर छत स्यूं निचै गिरकर बेहोश होगी । आँख्यां खुली जद देखी की म हस्पिटल कै बिछाणा में हूँ । आगै सासू खड़ी थी । मेरो पैर टूट चुक्यो थो, पग को भोत बड़ो ओपरेशन हुयो “तीन महिना बेड मा नै सुत्नु पर्छ है’’, डाक्टर बोल्यो । पिहर में माँ प्यारालाइज्ड होकर सालां सै बिछाणा में ई पड़ी थी, इसी अवस्था में कुण कराव म्हनै तीन महिना तक बिछाणा में आराम ! अर कुण देखसी म्हारा धणी अर टाबरां नै ! यही सब सोचकर म खुद नै भोत ही असहाय महसूस करी ,और मेरी आँख्या बरबस ही भर्याई, चाणचकै ही एक कोमल हाथ मेर माथा पर आकर पड़्यो अर कड़क आवाज सुणाई दी , “ क्याँ की चिन्ता करै है तू ? अर तेरी ए आँख्या भीजी कैयां ? म्हारै होतां हुयां ?’’ बा आवाज मेरी सासू माँ की थी ! म उन्हाको हात कसकर पकड़ लियो और भोत देर तक बस रोती रही रोती ही रही ।


(कवयित्री, स्वतंत्र लेखन, अध्यक्ष, नेपाल अग्रवाल महिला मंच, धरान, नेपाल)
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