• २०८० मंसिर १९ मङ्गलबार

शिक्षक ही पंख लगाते हैं

सुषमा दीक्षित शुक्ला

सुषमा दीक्षित शुक्ला

तमतोम मिटाते हैं जग का,
शिक्षक धरती के दिनकर हैं ।

हैं अंक सजे निर्माण प्रलय,
शिष्यों हित प्रभु सम हितकर हैं ।

शुचि दिव्य ज्ञान के दाता वह
सोने को पारस मे बदले ।

वह सृजनकार वह चित्रकार,
वह मात पिता सम सुधिकर हैं ।

कच्ची मिट्टी को गढ़कर के,
वह सुन्दर रूप सजाते हैं ।

देते खुराक मे संस्कार,
वह ज्ञानाहार कराते हैं ।

शिक्षक ही पंख लगाते हैं,
सपनों की भरने को उड़ान ।

पावन शिक्षा के मंदिर के,
वह ही भगवान कहाते हैं ।


सुषमा दीक्षित शुक्ला, लखनउ, भारत
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