• २०७९ असोज १९ बुधबार

कविता

इन्दु तोदी

इन्दु तोदी

कलम सूं  कागज को अनुठो अनुराग है कविता,
भावनावां को उमड़ घुमड़ बादलां को रास है कविता,
जो धरती सूं मिल पाव कदै
तो कदै आकाश मे ई विलीन हो जाव, बा तृप्त तो कदै अतृप्त प्यास है कविता,
जैयां चांद बिना की अंधेरी रात,
है अधुरा सारा सुर अर साज
बिना कविता ।
कदै भटकै दूर दूर
तो कदै निकट अति पास,
बा है कविता ।
कदै घाव पै मरहम,
तो कदै बण जाव हमदम
बा है कविता ।
हो जाव जद हियो तार तार,
राखै हिया पर हाथ
सहलाव है जज़्बात,
सहेली खास भोत खास है
बा है कविता ।
आकाश सूं परै,
समुद्र तळी सूं तळै,
सूरज सूं  तेज,
वायु सूं द्रुत आवेग,
नाजुक भावां नै राखै खूब सहेज
निकट अति पास, बा है कविता ।
भटक्या नै राह दर्शाव,
आहत मन में राहत बरपाव , सहलाव,संभालै बा है कविता ।
निराशा में भरै है आश,
हतास मन म भरै है साहस
आराम, कड़ी धूप म शीतल वास
आश्रय और अवकाश है कविता ।
कदै गजल तो कदै गीत, कदै भजन
तो कदै प्रेमरंग,
सौन्दर्य और प्रीत है कविता ।
कदै विभिषिका तो कदै भिषण द्वन्द और रण
तो कदै शान्त सुरम्य वन है कविता ।
आंचल की छांव सी, बचपन कै गांव सी
मखमल कै तान सी, कड़कडाती ठण्ड में नुवाई आंच सी है कविता ।
कवि की साधना है, परम पिता परमेश्वर की आराधना है,
मिलन है आत्मा सूं परमात्मा को
आनन्द, तड़प, विरह, योग, राग अनुराग की चरम उपासना है कविता ।
निर्गुण निराकार रुप सी तो कदै सगुण विराट स्वरूप सी है कविता ।
ध्यान, जप, तप, साधना और ईश्वर की सच्ची आराधना भी है कविता !


(धरान (नेपाल)
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