• २०७९ असोज १६ आइतबार

खिल-खिल हँसता निर्झर

अनिता रश्मि

अनिता रश्मि

बहुत खूबसूरत है झारखंड । किधर से भी, किधर को निकल जाएँ, हरियाली भरी वादियाँ, नदी, पर्वत, पठार आपकी बाँहें गह लेंगी… रास्ता रोक लेंगी ।
सुप्रसिद्घ पार्वत्य क्षेत्रों की मनभावन खूबसूरती से किसी भी तरह उन्नीस नहीं यह राज्य… बेहिसाब हरियरी, खूबसूरत घाटियाँ, मदमाते वन, छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ, नयनाभिराम जलप्रपात, बेशुमार नदियाँ, अद्भुत रंग-बिरंगे कुसुमोंवाले पादप…ऐतिहासिक किले, मंदिर… अनगिन लोककथाओं, लोकगीतों में झरती शहीदों से लेकर इतिहास तक की गाथाएँ !
क्या नहीं है यहाँ। हाँ ! बस यहाँ स्नो फाॅल नहीं होता । हालांकि यह कमी ओला पूरी कर देता है । कब अचानक ओले पड़ने लगे तेज आँधी-बारिस के साथ… बिछ जाए खेत-खलिहान, टुंगरी-टांड़ ( पहाड़ी-मैदान ) में, कहना मुश्किल।
वैसे, नदियाँ कोपभवन में जा बैठीं हैं आजकल । उनके नाम पर बालुओं-चट्टानों के दर्शन हो सकते हैं काफी जगहों पर ।
अनेक विधाओं में आवाजाही के दौरान यात्रा वृत्तान्त लेखन मुझे सबसे ज्यादा प्रिय लगता रहा है । वजह- उपन्यास, कहानी, लघुकथा तकलीफ़देह स्थितियों पर तकलीफ़ में डूबने के बाद लिख पाई ।
लेकिन जीवन में केवल दुःख-दर्द, तकलीफें नहीं हैं । प्रकृति ने जितना कुछ दिया है, जो दिया है, सब आन्नद की सृष्टि करता है… आन्नद की अलौकिक वर्षा! मानव-प्रदत्त अनेक चीजें, निर्माण भी । अतः यायावरी हमेशा सुखद । कई अज्ञात रहस्यों से रू-ब-रू करानेवाला भी । उस पर लिखना हमेशा सुखदायी ।
बहुत दिनों से राँची के आस-पास के प्राकृतिक स्थलों के नवीनतम बदलाव से मिलने की इच्छा थी । अनगिन निर्झर हैं झारखंड के लगभग हर क्षेत्र में- जोन्हा, हुंडरू, दशम, हिरणी, तमासीन, खयैवा बनारू और भी अनेक निर्झर यहाँ के लोगों के दिल-दिमाग को सरस बनाए रखते । खूबसूरती इतनी कि पर्यटक के पाँव जैसे बँध जाए ।
पहले भी कई जलप्रपातों में भटक चुकी थी । इधर फिर से इच्छाएँ जोर मारने लगी थीं । मैं परिवर्तन देखना चाहती थी हर निर्झर का । शुरूआत राँची-टाटा मार्ग पर स्थित दशम जलप्रपात से करना चाहा । और हम दो परिवार पहुँच गए राँची से लगभग 40 कि. मी. दूर बुंडु के दशम फाॅल को देखने ।
काँची नदी के जल से निर्मित यह फाॅल दस धाराओं में गिरने के कारण इस नाम से नवाज़ा गया था । कंडारी में पानी को दाअ तथा स्वच्छ को सोअ कहते हैं । स्वच्छ पानी के कारण ही इसका नाम दाअसोअ पड़ा पहले पहल । – किंवदन्ती कहती है। कालांतर में दासोम। फिर दशम !
हमारी मंजिल फाॅल न. 1 थी ।

परिवर्तन-
न चाहते हुए भी आप बीच-बीच में अतीत के हवाले हो जाते हैं । मैं भी हुई । बहुत पहले हम नीचे से प्रपात के पास पहुँचे थे । वहीं पतली धाराओं के नीचे स्नान किया था (तब नहीं थी इतनी क्षीणकाय) नीचे बहती काँची नदी के सहारे चट्टानों के पार भोजनादि बना था । बड़ी-बड़ी चट्टानें थीं लेकिन हम कठोर, काली चट्टानों पर पाँव धर दूसरी ओर गए थे । सामने था सबसे चौड़ा झरना । नीचे बहुत गहराई । पास जाना खतरे से खाली नहीं ।  हम पास गए भी नहीं… वह उम्र थी, साहस से भरी । बड़ों की निगरानी ने हिम्मत करने नहीं दी थी ।
आज सामने था, बेहद-बेहद खूबसूरत विहंगम दृश्य दशम का । ढंग से बनाई गई सीढ़ियाँ, पार्क, विभिन्न प्वांइट, जहाँ से एक सौ चौवालीस फीट की ऊँचाई से गिरते प्रपात का दर्शन सुलभ । और फिर गिरते खूबसूरत झरने का सरिता में ढलकर गहरी घाटी से आगे बढ़ जाना । पत्थरों पर उगा जीवन… जिजीविषा के धनी भरपूर गाछ पाषाणों की कठोरता को मात देते हुए पाषाणों पर ही उगे थे… वर्षों से… सदियों से ।
हम इस बार नीचे से अनगढ़ पत्थरों पर नहीं चढ़ रहे थे, ऊपर से उतर फाॅल को करीब महसूस कर रहे थे । हर प्वाइंट से दिखलाई पड़ रहा था निर्झर का हर कोना ।


झरनों से गिर काँची नदी सामने जिधर इठलाती-लचकती बढ़ गई थी, वह भी साफ नज़र आ रहा था । घनघोर जंगल भी । लेकिन झरना कई चट्टानों से फूटता नज़र आ रहा था । लाख छटपटाती रह गई, सीढ़ियों से या नीचे से निर्झर का स्त्रोत पता नहीं चल पा रहा था ।
जगह-जगह खाने-पीने की व्यवस्था, दुकानें । पार्क, जंगल का अद्भुत विस्तार पर्यटकों की किलकारियों से गूँज रहा था । सबको स्वच्छता का ध्यान रखना था… पूरी व्यवस्था थी । डस्टबिन हर जगह इंतज़ार में । कुछेक आदत से लाचार लोगों को छोड़ सब स्वच्छता का ध्यान रख भी रहे थे ।
गाइड, गोताखोर, स्थानीय आदमी जगह-जगह तैनात । अच्छी व्यवस्था पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ।
हम एकदम नीचे जाकर झरने का आन्नद ले रहे थे । पास बैठने पर हवा के झूले पर झूलती फुहारें धीमे-धीमे भिगोकर मन-प्राण तक संतुष्ट कर दे रही थी । काफी समय वहाँ बिताया । स्थानीय लोगों को यहाँ रोजगार मिला है । कुछ वनवासी वनोत्पाद की भी बिक्री कर रहे थे । नीचे निर्झर के पास खाना बनाना मना हो गया है अब ।
लौटते हुए दशम फाॅल 2 पर भी जाने का फैसला खुशियों से भर रहा था । ऊपर से नए बने रेस्तरां की छतरियाँ, काँची नदी बुला रही थी । ऊपर से ही गहरे झरने को ज्यादा पास से अच्छी तरह देख पाने का लालच भी कम नहीं था । जाने को सीढ़ियाँ नहीं, पथरीले कच्चे रास्ते ।
हम वापस लौट वहीं दाहिनी ओर से फूटी उबड़-खाबड़, धूल धुसरित राह पर बढ़े । विभिन्न जगहों पर बाँस से घेर प्लास्टिक लगाकर लोग रह रहे थे । बहुत कम कीमत पर वहाँ के लोग भोजन बनाकर खिलाते हैं । एकदम घरेलू व्यवस्था ।
सामने काँची नदी का अद्भुत विस्तार… लेकिन अभी सिमटा हुआ था हरिताभ जल । कमर, सर पर डेगची, बाल्टी, घड़ा थामे काँची नदी के तट पर पानी भरने पहुँची आदिवासी स्त्रियाँ… चट्टानों पर कूदते-फाँदते साँवले-सलोने बच्चे… जंगल में टेंट के बाहर सुस्ताता वृद्ध ।… एक टेंट के अंदर परिवार की सुगबुगाहट, माँ का आँचल थामे नन्हें बच्चे । और तटिनी पारकर ऊपर छतरियों के निकट जाते लोग…! मैं भाई मानस, भतीजा निलय और बेटी अनुभा के साथ वहीं पत्थर पर बैठे देखती रही कुछ देर ।
मानस की इच्छा थी, प्रकृति के सान्निध्य में देर तक उसके अनहद नाद को सुना जाए, महसूसा जाए । आस-पास आकाशचुम्बी लाल पत्तियोंवाले कुसुम, यूकलिप्टस और अन्य विटपों की मासूमियत को परखा जाए । भोले-भाले वासिंदों के साथ समय बिताया जाए ।
लेकिन दिवाकर अपना तेज समेट रहा था और मुझे हर कीमत पर रास्ते के किंशुक (पलाश) को मोबाइल में कैद करना था । वे आते समय भर रास्ते आमंत्रण देते रहे थे । लौटते वक्त मिलने का वादा कर लिया था । बीच -बीच में वन में ‘आग ‘ लगी थी जंगल की आग (पलाश) से । मुझे उस आग से भेंट करनी थी ।
ये वही टेसू थे, जो अपना पूरा वज़ूद खोकर अपना सारा रंग जल को दे देते हैं और पहले के लोग इससे ही होली खेलते रहे हैं । अभी भी जंगल के वासी होली में इन्हीं परासों (पलाशों, टेसू) से रंग उधार लेते हैं ।
हम गाड़ी की ओर लौट पड़े । वहाँ इंतज़ार कर रहे थे पति ओम जी और रूबी । मैं कुसुम गाछ की ऊँचाई में डूबी पीछे गई कि वहीं एक जगह पर दो लोग छोटे से आशियाने में महुआ के दारू में व्यस्त मिले । उसी ने बताया, यह ललछौंहा गाछ कुसुम है । ऊपर से ताकता जैसे निगरानी कर रहा हो । महुआ चुलाकर दारू बनाने में माहिर हैं इधर के लोग । आस-पास गाँवों की उपस्थिति से गुलज़ार था दशम फाॅल । बीच के सालों में नक्सली की उपस्थिति की चर्चा आम थी । लेकिन अब वहाँ भय का वातावरण नहीं है ।
हर साल बलि लेता है दशम । -सब कहते थे । लेकिन अब नहीं । चाक-चौबंद व्यवस्था । पर्यटक मित्र सुरक्षा के लिए तैनात । एक लोककथा यहाँ करवट लेती है ।

लोककथा-
कहा जाता है, यहाँ छैला की प्रेमकथा आकार लेती रही है । अपनी साँवली-सलोनी प्रेयसी से मिलने गहरे रंग का बाँसुरी वादक छैला काँची नदी से निर्मित झरने को पारकर रात में ऊपर पहुँच जाता… जंगली मज़बूत बेलों के सहारे ।
उसकी बाँसुरी की तान में राधा की तरह दीवानी उसकी प्रेमिका उस साँवले कृष्ण से मिलने को बेताब रहती थी । उसके प्रेम में पूरी पागल थी । दीवाने थे दोनों ।
गाँववालों को उनकी रासलीला रास नहीं आ रही थी । लता के सहारे झरना पारकर अपनी प्रेमिका से मिलने जाता है छैला… सब तरफ यह शोर था । अंततः एक रात झरना पार करते समय लता काट दी गई और वहाँ से गिरकर छैला की दर्दनाक मौत हो गई । बाँसुरी की मीठी तान मौत की चीख बन गई सदा के लिए । प्रेम अगन दशम के जलधार में डूब गई ।
सब कहते हैं, इसी के कारण बलि लेती रही है नदी। लेकिन प्रशासन की चाक-चौबंद व्यवस्था में आजकल दशम में डूबकर मरनेवालों की संख्या नगण्य । सब जगह घूमें, बस चौड़े जलप्रपात एवं गहरी नदी की ओर न जाएँ ।

खैर, अब हम वापसी की राह पर । तैमारा गाँव पूरे यौवन पर । जगह-जगह पुराने ढंग के साफ-सुथरे घर, खलिहान प्रकृति की गोद में सुस्ताते हुए । कहीं-कहीं सोहराई पेंटिंग की चमक। झारखण्ड के शहरी क्षेत्रों, कई बस्तियों, ग्रामों में फूस-खपडे़ की छत को आजकल पक्के घरों ने परे खिसका दिया है । नहीं दिखते आसानी से मिट्टी के कच्चे, घास-फूसवाले घर ।… वहाँ मिले । पर सब जगह बिजली के तार कच्चे घरों के अंदर रौशनी की उपस्थिति की गवाही दे रहे थे ।
वहाँ पर खेतिहर व्यक्तियों की बस्ती, खेती के विविध औजार, पुआल, हल, खलिहान, मचान, बाहर फुरसती बतकही में व्यस्त लोगों, उनकी बकरियों, बत्तखों, मुर्गियों को देखते हुए हम बैक टु दी पैवेलियन ।
हाँ ! डूबते प्रभाकर की ललहुन रौशनी के बढ़ते वृत्त के बावजूद मैं  ‘जंगल की आग’ को कैदी बना लेने में सफल रही, यह संतुष्टि साथ थी । झरने सी हँसी सबके चेहरे पर सबको उद्भासित करती हुई हमारी यादों में देर तक बसी रही । गर्मियों में अब नदियों के सूख जाने के कारण झरने का कंठ भी सूख जाता है । अतः बरसात में या वर्षांत से मार्च के अंत तक घूम लेना ही श्रेयस्कर । आने-जाने के लिए हर क्षेत्र से गाड़ियाँ आसानी से उपलब्ध ।


– 1 सी, डी ब्लाॅक, सत्यभामा ग्रैंड, कुसई, डोरंडा, राँची, झारखण्ड -834002

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