• २०७९ असोज १६ आइतबार

अहाँ सैनिक छी

कंचना झा

कंचना झा

अभिमान अछि जे हम अहाँके नामक
सिंदुर, चुडि़, बिछिया, पायल, मेंहदी
लगाबैत छी, हमर नाम देशक
सैनिक संग आबैत अछि
अप्पन मुनमे अहाँ हमर नाम लिखने छी
अहाँ सैनिक छी ।
हम गाममे माए संग रहैत छी
अहाँ मातृभूमिके लेल
हमरा सँ बहुत दूर रहैत छी
बहुत तकलीफ होइत अछि
जहन पूरा गाम उत्सवमय होयत अछि
हम माए बाबू आ अहाँके ललना
पुछैत अछि बाबूजी कहिया एथिनरू
अहिबेर फेर हम नहि आबि सकब
अहाँ लिखने छी
अहाँ सैनिक छी ।
दुर्गापूजा, कालीपूजा बित गेल
फगुआ ललचिया गेल अछि
हम बाट जोहि रहल छी
मोन चिहायल रहैत अछि
जाइत काल कहने रहि
हे हमर पहिल प्रेम हमर
मातृभूमि अछि लऽ हाथमे बंदूक
देशरक्षामे लागल छी,
अहाँ सैनिक छी ।
फगुआमे आबि सकैत छी
किछ दिन पहिने अहाँ लिखन रहि
मुदा मोन डरायल अछि
कि अहिबेरक फगुआ
सेहो अहिना बितत रू
रंग अबिरके बिना रू
माए भनसाघरमे नोर बहेती
हम पैरक नह सँ धरती कुरेदब
बाबू चौकी पर उदास बैसल रहताह
आ बौआ नुआ तानत, माए हमहुँ  खेबै पुआ
खेलबै होरी, आ गायब जोगिरा
मोरनी सन हमहुँ नचबै
जँ बुझबै अहाँ आबैत छी
अहाँ सैनिक छी ।

कर्तब्य राहमे हम नहि बाधक बनि
सीना तानि अहाँ लागल रहूँ,
गामघरक चिंता छोडि़ अहाँ
देशहितमे लागल रहूँ
एक क्षणके उदासी अछि
फेर भागि जायत
मुदा अहाँ विचलित नहि होयब
हम मिथिलाके नारी शक्तिशाली छी
हम सैनिक पत्नी बनी जन्मो जन्मो
याह आस लगौने छी
अहाँ सैनिक छी ।


(उप प्राध्यापक, रेडियो कार्यक्रम निर्माता-प्रस्तोता एवं पटकथा लेखक )
[email protected],com