गोरे नन्द जशोदा गोरी तू कत स्यामल गात - Aksharang
  • २०७८ जेठ ४ मङ्गलबार

गोरे नन्द जशोदा गोरी तू कत स्यामल गात

डा. श्वेता दीप्ति

डा. श्वेता दीप्ति

भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण व्यक्तित्व जितना मोहक था उतना ही रहस्यमय भी । उनकी लीला भी उतनी ही न्यारी थी । सुंगध, सौंदर्य और सात्विकता का त्रिवेणी संगम थे भगवान श्री कृष्ण ।
हिन्दी साहित्य में कृष्ण भक्त कवि के रुप में रसखान का कृष्णप्रेम अद्वितीय है । रसखान का अपने आराध्य के प्रति इतना गम्भीर लगाव है कि ये प्रत्येक स्थिति में उनका सान्निध्य चाहते हैं । चाहे इसके लिये इन्हें कुछ भी परिणाम सहना पडे । इसीलिये कहते हैं कि आगामी जन्मों में मुझे फिर मनुष्य की योनि मिले तो मैं गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहने का सुयोग मिले । अगर पशु योनि मिले तो मुझे ब्रज में ही रखना प्रभु ताकि मैं नन्द की गायों के साथ विचरण कर सकूँ । अगर पत्थर भी बनूं तो भी उस पर्वत का बनूँ जिसे हरि ने अपनी तर्जनी पर उठा ब्रज को इन्द्र के प्रकोप से बचाया था । पक्षी बना तो यमुना किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहीं सकती बसेरा करने के लिये ।

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन ।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन ।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन ।
जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।।

ऐसे हैं हमारे कान्हा । सबके प्रिय सबके दुलारे । कान्हा का रंग इतना मोहक है कि कई बार नायिका भी यह कहती है कि मोरा गोरा रंग लइले मोहे श्याम रंग दई दे । खुद कान्हा भी तो कहते है कि राधा क्यों गोरी मै क्यों काला । यहाँ तक कि जब सूतिकागृह में राजनंदिनी यशोदा ने जब अपने बगल में छोटे शिशु को देखा तो वे सोचने लगीं क्या यह बालक मणिमय है ? इसके शरीर के अंग नीलमणि (नीलम) से, होठ रक्तरागमणि (रूबी) से और नख अनार के समान दानों वाली हीरकमणि या पुखराजमणि से बने हैं । परन्तु यह तो संभव नहीं, क्योंकि मणि तो कठोर होती है । यह शिशु तो अत्यन्त मृदु और सुकुमार है । लगता है विधाता ने इसकी रचना पुष्यों से की है मानो नीलकमल से इसके अंगों का, बन्धूकपुष्पों से इसके होंठों का. जपाकुसुमो से इसके हाथ व पैर के तलवों का और मल्लिकापुष्पों से इसके नखों का निर्माण हुआ है । इसी कारण वे श्रीकृष्ण को नीलमणि’ कहकर बुलाती थीं । यहाँ तक कि ब्रजवासी भी उनके रंग पर सवाल उठाया करते थे । जब इन्द्रदेव के कोप से बज वासियों और गोओं की रक्षा के लिए श्रीकृष्णा ने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका ऊगली पर उठाया तो सभी लोगों को प्रसन्नता हुई कि कन्हैया कि वजह से ब्रज वासियों और गौओं की रक्षा हुई, लेकिन अनेक लोगों को शंका होने लगी कि क्या यह नन्दजी का लाला है या कोई बड़ा देवता है ?

ब्रजबासी नन्द महल के आंगन में एकत्र हुए और कहा कि यह आपका पुत्र नहीं हो सकता । नन्द गोरे है, नन्दरानी यशोदा गोरी हैं, पर कन्हैया काला क्यो है ? क्या नन्दबाबा किसी दूसरे का लड़का ले आए’ सभी ने नन्दराज जी से आग्रह किया महाराज ! आप सच सच बताइए, क्या यह कन्हैया आपका लड़का है ? नन्दबाबा ने हाथ जोड़कर कहा मैं अपनी गायों की शपथ खाकर कहता है कि कन्हैया मेरा पुत्र है । श्री कृष्ण उस समय यशोदा की गोद में खेल रहे थे । जब ब्रजवासियों की बात यशोदा जी ने सुनी तो उन्होंने विनोद में श्रीकृष्ण से पूछा बेटा ! तू किसका पूत्र है ? श्रीकृष्णा मचलते हुए बोले मैं तेरा बेटा हूँ और तू मेरी मां है । माता ने कन्हैया को पुचकारत हुए कहा । बेटा ! ये सब संदेह कर रहे हैं कि मैं और नन्दबाबा गोरे हैं फिर तू काला कैसे हो गया।
श्रीकृष्ण ने कहा मां ! इसमें तेरा दोष है । मेरा जन्म अंधियारी रात्रि को बारह बजे हुआ । मैं तुझे जगाने लगा, किन्तु त जगी नहीं । इसलिए मैं सबेरे तक अन्धकार में लोटता रहा । अन्धकार मुझसे लिपट गया, इसलिए मैं काला हो गया । सूरदासजी ने श्रीकृष्ण के बालसुलभ मन में उठने वाली इसी शंका को बड़ी बारीकी के साथ चित्रित किया है ।

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो ।
मोसौ कहत मोल को लीनों, त जसमति कब जायो ?
कहा करौं इहि रिसि के मारे, खेलन हौं नहीं जात
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरी तात
गोरे नन्द जशोदा गोरी तू कत स्यामल गात ।

हम सभी मानते हैं कि भगवान कृष्ण का रंग सांवला या श्यामवर्णी था । श्याम रंग अर्थात कुछ-कुछ काला और कुछ-कुछ नीला । मतलब काले जैसा नीला । जैसा सूर्यास्त के बाद जब दिन अस्त होने वाला रहता है तो आसमान का रंग काले जैसा नीला हो जाता है।श्यामवर्ण का सही अर्थ होता है काला और नीला का मिश्रित रंग । परंतु कृष्ण की त्वचा का रंग मेघ श्यामल था अर्थात काले, नीले और सफेद रंग का मिला-जुला ।
जनश्रुति अनुसार उनका रंग न तो काला और न ही नीला था । यह भी कि उनका रंग काला मिश्रित नीला भी नहीं था । उनकी त्वचा का रंग श्याम रंग भी नहीं था । दरअसल उनकी त्वचा का रंग मेघ श्यामल था । अर्थात काला, नीला और सफेद मिश्रित रंग ।
नीला रंग विस्तार को दर्शाता है । आप देखेंगे कि इस जगत में जो कोई भी चीज बेहद विशाल और आपकी समझ से परे है, उसका रंग आमतौर पर नीला है, चाहे वह आकाश हो या समुंदर । जो कुछ भी आपकी समझ से बड़ा है, वह नीला होगा, क्योंकि नीला रंग सब को शामिल करने का आधार है ।

कृष्ण की प्रकृति के बारे में की गई सभी व्याख्याओं में नीला रंग आम है, क्योंकि सभी को साथ लेकर चलना उनका एक ऐसा गुण था, जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता । वह कौन थे, वह क्या थे, इस बात को लेकर तमाम विवाद हैं, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उनका स्वभाव सभी को साथ लेकर चलने वाला था ।
चूंकि श्रीकृष्ण की ऊर्जा या यूं कहिए कि उनके प्रभामंडल का सबसे बाहरी घेरा नीला था, इसीलिए उनमें गजब का आकर्षण था । ऐसे हैं हमारे लल्ला श्रीकृष्ण अद्भुत अद्वितीय अपूर्व सबके चहेते सबके लाडले ।


(डा. श्वेता दीप्ति त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य की उप-प्राध्यापक हैँ)
shwetadeepti1810@gmail.com