मलंगवा- मेरा गांव - Aksharang
  • २०७८ असार ५ शनिवार

मलंगवा- मेरा गांव

ध्रुव जोशी

ध्रुव जोशी

विश्व के परिदृश्य में
एक छोटा सा गांव
मलंगवा !
जहाँ मैं खेलते हुए पला और बडा हुआ
यहीं मैं पैदा हुआ ।

मलंगवा !
यह सिर्फ गांव ही नहीं मेरे लिए
यह एक जजवा है, संवेदना है, पहचान है
यादें हैं, हिचकी हैं, बचपन का आसमान है
मेरे लिए यह कावा है और चारो धाम है ।

मलंगवा !
झोपडी और खपरेल के घरों का पडाव है
चिडियों के घरौदे का एहसास है
धूल भरी सडकें, घुमावदार पगडन्डियाँ
घन्टियों के आवाज के साथ
गोधूलि में लौटते ढोर और मबेसियाँ
हर इन्किलाब का बेजुवान गवाह है
मेरे लिए तो जैसे चेतना का शबाब है ।

मलंगवा !
दूर- दूर तक फैला हुआ सपाट मैदान है
जेठ की सुनसान भरी दुपहरि में
तपता हुआ खेत और खलियान है
आम के बगिया तले खटिया डाले
जैसे अलसाय लेटा कोई इन्सान है
यही मेरा गांव है
इसी से जुडा मेरा अभिज्ञान है ।

मलंगवा !
भूगोल के फैलाब में गुमसुदा मेरा गांव
इसी ने मुझे जिनेका फलसफा सिखाया
मेरे पंखों को आकाश मिला
मेरे हौसले को परवाज दिया
मैं आज भी मिलुंगा वहीं पर खडा
कोई अपनो को कैसे छोड जाए भला
पर बात इतनी सरल भी नहीं
इसी पशोपशे में सदा मैं उलझा रहा
और कह नहीं सका आज तक
मलंगवा ! तुझे अलबिदा ।

मलंगवा !
आज बदल रहा है
बरसात के बाद उगे कुकुरमुत्ते जैसा
चारों ओर सर उठाता कंक्रिटका मकान
यह मकान हैं सिर्फ आवास
नहीं देता यह घरों का एहसास
यह तो बेलगाम आवारा भोगवादी मृगतृष्णा का
एक अमूर्त पेन्टिङ्ग सा
मेरे गांव के कैनभास में
जडा एक कोलाज जैसा है ।

मलंगवा !
मेरे गांव को आज किसी की नजर लगी है
अविश्वास और दूरियाँ हवा में  तैरती है यहाँ वहाँ
अतिरञ्जना हुँकार भरता है यहाँ
और क्षत- विक्षत करता है चेतना को
अभ्यन्तर की गहराई में छुपी मेरी यादें
उछल- उछल कर सर उठाती है
और ‘फ्लैस बैक’के तरह जहन में उतरती है
मदेस आन्दोलन का उन्माद भरा अतीत
जहन भूले नहीं भूलाती है
आंखों में लोगों के खून दौडता मैने देखा था
सियासी रोटी सेंकने में माहिर नेताओं को
अलगाव का सरारा फैलाते देखा था
सदभाव के पेंड जो पुर्खों ने संवार के रखा था
उसी के जड़ों पर
इन वहसी ‘जयचन्दों’ ने बार कर
हमें ‘पहाडी’ और ‘मदेसी’ में बाँट दिया
उस दिन मलंगवा !
तुम ‘झिम नदी’ में आए उछाल से लगे
तुम कुछ अनजान भी लगे
पर थे तो तुम अपने ही सगे
मेरी उदास आंखें आसमान को देखता रहा
कई रावण मेरे विश्वास के कबुतर को लहुलुहान करता रहा ।

मलंगवा !
मैं विस्मित था
पर दूसरे ही पल याद आया
रिश्ते सिर्फ खून के ही नहीं होते
कुछ दिलों से भी जुड़े होते हैं
इसी रिश्ते ने सोचने को मजबूर किया मुझे
मेरी रंजिसे हवा हो गई
मैं फिर यादों के झरोखे से ताकने लगा
गम्हरियावाली काकी और रामकली भौजी के दूरे पर बैठकर खाए
छठ का ठेकुवा और होली में पुवा
यह सिर्फ मुँह में जायका ही नहीं जताता है
मेरे चेतना को कुरेद कर जगाता है
और बहुत कुछ बताता है ।

अनकही सदभाव की कहानी है यह
परम्परा और आस्था की गवाही है यह
हमारे रिश्ते और संस्कारों की धूरी है
इसके बिना मेरे लिए
मलंगवा !
तेरी कल्पना अधुरी है ।


(जोशी पेशा से कृषि वैज्ञानिक हैँ,  वे पत्रकारिता के साथसाथ साहित्य सिर्जना भी करते हैं ।)
joshy.dhruva@gmail.com