कविता
कविताओं में गढ़े हुए
जो शब्द हैं
रोते, गाते हैं
सुनना तो सीखो ।
कह रहे कई बातें अनजानी
कुछ बातें जीवन से बेमानी
धीमे धीमे, सहम सहम कर बोल रहे हैं
सब पाठक को
सुनना सीखो ।
गरज रहे कुछ शब्द
और कुछ डरे हुए हैं
कुछ धीमे से मुस्काते हैं
हृदय खोलकर
सुनना सीखो ।
चुभते हैं कुछ शब्द व्यवस्था को,विधि को
क्यों चुभते हैं
मंथन कर के शब्द शब्द की गणना सीखो
हड़बड़-हड़बड़ पढ़ो नहीं
तुम सुनना सीखो
शब्द ही अमृत,शब्द ही विष हैं
कभी विष अमृत है,अमृत विष है
शब्द के तल में डूब-डूब कर
पढ़ना सीखो
शब्द जो कहना चाह रहे हैं
सुनना सीखो ।
सृजन नहीं करता है कभी कवि
बेचैनी के आमंत्रण को
शांत चित्त और शुद्ध हृदय से
शब्द- शब्द के बंधन को
तुम गिनना सीखो
इनके भीतर से आवाज़ आ रही
सुनना सीखो ।
सुनना सीखो ।
अनिल कुमार मिश्र, राँची, झारखंड, भारत ।