अतीतसंग साक्षात्कार - Aksharang
  • २०७८ मंसिर १३ सोमबार

अतीतसंग साक्षात्कार

विन्देश्वर ठाकुर

विन्देश्वर ठाकुर

सेप्टेम्बर महिनाके वृहस्पति दिन,एखन बेरु पहरक ४ बाजिरहल छै।यद्यपि दोहाक घमघमाब’ बला गर्मी जहिनाके तहिना पसरल छैक । घरसँ बाहर जेना एकदमसँ धाह फेक रहल छै । बचबाक लेल एकटा उपाय जे प्रायः लोकक जिनगीके एत’ सहज बनबैछै से ए.सी.। घरभीतर आ कि गाडीमे सेहो एसीक ठन्ढैमे लोकक जीवन जेना तेना सहजे कटि रहल छैक। हमर रूमके चारिगोटेमेसँ दू गोटे ड्युटीमे आ तेसर फोफ काटि दक्षिण बरिया खाटपर मस्त निन्नमे निसभेर भ’ सुति रहल छै । पुबरिया खाट प’ पश्चिमदिस तकिया उपर अडेस लागल हम मैथिली साहित्यिक मूर्धन्य साहित्यकार आदरणीय परमेश्वर कापडी जीक ‘पथार’ कथा पढि रहल छी । गामक जीवन ओ खेती-किसानिक जीवन्त चित्रण करैत लिखल गेल एहिमेक कथासभ एस्गरे पढैत…एस्गरे मुस्कियाइत, एस्गरे मनन करैत जिनगीक लौकिक-परलौकिक चरम आनन्द प्राप्त क’ रहल छी ।
रेडमी ब्छ के वाट्स एप्पमे पहिने दू टा मेसेज फेर अनवरत कल आबिरहल छै । हम पोथीपरसँ धियान हटबैत मोबाइल दिस तकैत छी । मीन भाइके फोन छै । तुरन्त फर्केलियै.. ‘हेल्लो !’
‘हजुर दाइ नमस्ते ! आरामै हुनुहुन्छ ?’
‘हमहूं नमस्ते करैत’ हां !‘भाइ नमस्ते ! ठीक छु म । आफ्नो भन ! सरी बिजी थिएँ है…त्यसैले फोन उठाइनँ ।’
‘इट्स् ओके दादा भन्दै….अन्त्यमा अनि सुन्नूस् न ! अस्ति भनेथेँ नि ! पार्टीको कुरा…आजै हो है दादा….सबेरै ७ र ७ः३० बजेतिर आइपुग्नुहोला… नभए म कल गर्छु ।’
हम ‘ओके आइहाल्छु । कल गर्नु पर्दैन’ कहिक’ आश्वासन देलियै । मीन भाइ ढल्केबरके एक नीक आ सुशील व्यक्ति छै । एकर पूरा नाम मीनबहादुर श्रेष्ठ छैक । हमर कम्पनीएक साइडमे कतार नेशनल कम्पनी कहिक’ छै ।ओहिमे एकटा सेल्समेन रुपमे काज क’ रहल छैक । काज आ ढौवा दुनू मन पसंदक भेलासँ बितल ३ सालसँ घर नइँ गेलैए । हमरा लग बराबर केश- दाढी कटाब एलाक कारणे आ घन्टौ तक बैसक गप-सरक्का मारलाक कारणे हमरासंग बहुत बेसी घनिष्ट होएब स्वाभाविक छै ओकरा लेल ।
हम निर्धारिते समयपर लगभग गेलहुँ । पार्टी कोनो खास नइँ रहैक मुदा भतिजा भेलाक खुशी मे अपनहि रूमक साथीसंगी आ दू-चारिगोट हितमितके ल’ क एकटा भेटघाट आ मनोरंजन रहैक । से हमसब ७ गोटे भ’ गेलहुँ आ माउस-भात, सलाद विथ नेपोलियनके जबर्जस्त जमघट चललै । मस्ती-मजाक सेहो खूब भेलै । ओहुना कतारमे शुक्र दिनक’ छुट्टी भेलाक कारणे वृहस्पतिके रातिमे फुल्ल मस्ती करबाक छुट होइछै । एहिबीच मीन भाइ घरमे भिडियो चैट केलक आ हमरालोकनिके अपन भतिजाक देखेबाक प्रयत्न केलक । पहिने हुनक माँ, फेर बाबुजी, फेर भाइजी आ अन्तमें ओकर भौजी अपन भर्खर जन्मल पुत्रक संग भिडियो चैटमे आएल… बच्चाके देख’सँ पहिने नजरि ओकर भौजीपर पड़ल । हमरा लेल त आकाश डगमगागेल…धरती डोल लागल…श्वास आ धडकन जेना एक्केबेर रुकिगेल हो । पृथ्वीक गति थमिगेल हो…तहिना लागल….ई त उषा छियै । उषा ढकाल…हमर कैम्पसक साथी… साथी आ कि प्रेमिका… ओह माइ गड ! हम एकदमसँ अब्बाक ! मुंहसँ किछु बजाएल नइँ मुदा नैनसँ नोर टपकिगेल… से हमरे नइँ… ओकरा सेहो… हम हतपत.. हर्बराइत मीनसंग विदा ल’ रूम पहुँचलहुँ… चट द’ बेडपर पड़ी रहलौ… मस्तिष्कमे नाचिरहल अछि सिनेमाक चलचित्रजकाँ पाँच बरख पहिनुका अपन कैम्पसक जिनगी…
हमर कैम्पसक पहिल दिन । मोनमे अनेकानेक तरंगसब उठब स्वभाविक ।कैम्पसक परिवेश,अध्यापकसभक स्वभाव, मित्रता बनएबाक आतुरता आदि-इत्यादिसँ मोन एकदमसँ बिचलित रहए । जनकपुरक आँगन मे बाह्रबिघाक मैदानके उतरबरिया- पश्चिमबरिया कोन्हपर अवस्थित अछि- संकटमोचन मन्दिर आ तेकरे सटले अवस्थित अछि जानकी माध्यमिक- विद्यालय जनकपुरधाम । तही विद्यालयमे साँझुक समयमे संचालन होइत अछि (जनकपुर क्याम्पस) जनकपुरधाम कहिक’ रात्रिकालीन अध्यापन ।कैम्पसक पहिल दिन ५ः१५ मे भीतर प्रवेश केलहुँ । मोन एकदमसँ प्रसन्न रहए । जिनगीक १८ औं बर्षमे पहिल बेर मौका भेटल छल-कैम्पसमे पढबाक । कैम्पस देखबाक । कैम्पसके अनुभव करबाक । से मोनक दरबज्जापर प्रसन्नताक सहनाइ बजनाइ कोनो नव बात नइँ रहए । देखैत-सुनैत… घुमैत-फिरैत ५ः३० दिस एघारके कक्षामे प्रवेश केलहुँ । विषय रहए Introduction तय Education (शिक्षाको परिचय) । एहि विषयक सर भूतपूर्व जबान होइतो देहमे एकदमसँ फुर्ती आ एकटा अलगे उमंगसंग पढाएब आरम्भ केलनि ।तत्पश्चात अंग्रेजी, नेपाली, Instructional padagogy आदि आदिक शिक्षकसभ अबैत रहलाह आ अपन-अपन कक्षा क’ जाइत रहलाह ।विद्यालयमे पढैत काल सरसब पढाइके साथ-साथ हाल समाचार आ अन्य कतेको व्यक्ति विशेष बातसब सेहो पुछिलैत छलाह मुदा पहिल बेर कैम्पसमे ठीक उल्टा भ’ रहल छल । सरके अपन विषय आ निर्धारित समयसँ बेसी आन कोनहुँ गप्पपर चर्च करब उचित नइँ बुझाइत छलनि सायद । स्कुल आ कैम्पसमे इएह फरक होइत छै । मोनहिमोन विचार आएल । कैम्पसक पहिल दिनक अनुभूति एहि तरहे कने खटगर, कने मीठगर आ कने करुगर रहल ।
समय अपना हिसाबे बितैत गेल । २ महिनाधरि मेजर अंग्रेजी पढ्लाक बाद अच्चानक एकदिन हमर मस्तिष्क एक अशातीत निर्णय केलक.. बिहान भेनेसँ अंग्रेजी नइँ हम मेजर नेपालीक कक्षामे बैँस लगलहुँ । नेपाली हमर शुरु एसँ रुचिगर भेलाक कारणे वा कि शिक्षिका नीकसँ पढेलाक कारणे मुदा पहिनही दिनसँ मेजर नेपालीक कक्षा हमरा खूब रुचिगेल । अन्ततः नियमित नेपाली कक्षामे बैँस लगलहुँ । ओहिमे लड़कासँ बेसी लड़कीक सङ्खया छल यद्यपि लोक जतेक सोचैत छै नेपाली विषय ओतेक सहज छैक नइँ । करिब हप्तादिन क्लास केलाक उपरान्त हमर भेट एकगोट पहाड़ी समुदायक लड़कीसँ भेल । मध्यम उचाइ, गोर रंग, नाक कने मोट आ हल्का चिपल, छोट-छोट आँखि, करिया मेघसन केश, मध्यम ठोर आ केशक उपर उज्जर रंगके हेयरबिन । दहिना हाथमे क्यूएनक्यू घड़ी, स्कूलक शूट-सलबार आ ब्लैक कलरक जुत्ता । देखएमे लाजबाब नइँ त मध्यमवर्गक खूब निमन छवि । बातबातपर मुस्की आ बीच-बीचमे टोन ओकर जन्मजात गुण रहैक । मैडमके हरेक प्रश्नक उत्तर देनाइ ओ अपन नैसर्गिक अधिकार बुझए । अपनाके अभर कन्फिडेन्स आ लोकक नजरिमे स्मार्ट बनब ओकर नेनपनके शोख । इहे आ एहने एटिच्युडसँ ओकराप्रति हमर नकारात्मकताक जन्म लेलक । कक्षासँ ल’ क बाहिरी कम्पाउन्डतक ओकर प्रकृति-प्रवृतिसँ बहुतोगोटे भीतरे-भीतर अपनाके निम्नवर्गीय महशुस करए लागल रहे । एकदिन प्रशंगवश क्वीज कम्पिटिसन भेल । जइमे लड़की पक्ष हारिगेल । क्रोधक ज्वाला ओकर आँखि, ठोर आ गालसँ देखि सत्ते ओइ दिन हम त्रसित भ’ गेल छलहुँ । एहन कतेकोबेर विविध क्षेत्रमे प्रतिस्पर्धा होइत रहल । दुनू समूह हारैत-जितैत रहल । एकबेरक बात याद अछि हमरालोकनिक व्यक्तिगत शर्त लागिगेल रहए । ओ नेपाली हमर समुदायक भाषा अछि तें हमहीटा अग्रपंक्तिमे रहब से जिद्द केलनि… तइ मे हम ओकरा कहने रही जे अहाँ टर्मिनलसँ ल’ क फाइनल तक जऽ हमरासँ कहियो कखनो बेसी अंक प्राप्त करब त हम एहि कैम्पसेसँ नइँ बल्की नेपाली विषय पढनाइ छोडिदेबै… एहि चुनौती अनुरुप टर्मिनलसँ ११ के अन्तिम परीक्षातक ओ हमरासंग नइँ जितली आ अन्त्यमे हारि मानिलेली ।
एकबेरक बात छै । जहिया कैम्पसे समयमे पहिनुके घन्टीमे ओकर पेटमे दर्द उखरलै आ ओ चिच्याइ लगलै । हम एकगोटे मित्रक सहयोगमे उठा-पुठाक’ क्लिनिक पहुँचेलौ आ सुइया-दबाई करा सही-सलामत ओकर डेरा पहुँचेलौ । धीरे-धीरे हमरा ओकर बीच झगडा-लड़ाइ खत्म आ मित्रताक मिठास बेसी होबए लागल । कैम्पसक एहन कोनो दिन वा कि कोनो घन्टी नइँ रहे जइमे एकबेर एकदोसरा दिस ताकिक’ नइँ मुस्कियाएल होएब आ नइँ लजाएल होएब । शनिके सुबहमे संकटमोचनक मन्दिरमे संगे दर्शन तकरबाद अनेकानेक ठाम घुमघाम आ मंगलदिनक कैम्पसँ पहिने संकटमोचनके दर्शन आ बाह्रबिघाके पानीपुरी ओ चनाचटपट्टीक स्वाद लेब हमरा लोकनिके नियमित कृयाकलाप भ’ गेल रहए । कोनो शनिके जानकी मन्दिरक दर्शन त कहियो रामजानकी हलमे नेपाली चलचित्र देखबाक मनोवृति बढैत चलिगेल । यद्यपि अध्यनसंग हमरालोकनि कहियो-कखनो कोनो सम्झौता नहि कएल ।आ हरेक परीक्षामे खूब नीकसँ पास भेल ।
समय अपना गतिसंगे बितैत गेल । २ के अन्तिम परीक्षा देलाक बाद एकदिन उषा हमरा मड़बामे बजौली । बहुतदेरतक गप्प-सप्प भेल । परीक्षा उपरान्त नतिजा प्रकाशनबाद स्नातकके पढाइ आ आगुक जिनगीक योजना लेल की-केना कएल जाए ताहि लेल भावुक छली उषा । ओहुसँ बेसी भावुक छल ओकर आँखि काल्हिसँ दूर रहबाक बात लेल । दू वर्ष पहिने अन्जान, तत्पश्चात शत्रुताक नजरिसँ आ एखन मित्रसँ बेसी एकाकारबला घनिष्टता… फेर दूर जएबाक लेल बिछोहक पीड़ा । सत्ते रहस्य-रहस्यसँ भरल अछि ई मनुख जीवन । कोनो बातके मोनक भीतर कतबो दबेलासँ जखन नइँ दबि पबैत छै त ओ नैनक सहारे मोतिक दाना बनि अश्रुपातमे परिणत भ’ जाइत छै । सेहे भेल उषाक मोनमे दबल भावना बिछोहक आभासँ पगलैत नैनक मादे पृथ्वीपर खसल । अपन जेबीसँ रुमाल निकालि ओकर आँखिक’ मोतिके पोछैत सम्हारैत बेस होसियारीसंग किछु कलात्मक शब्दगुच्छासंग सम्झेबाक बहुतरास प्रयत्न केलियै । बीच-बीचमे फोनमे बातचित आ फेर नतिजा प्रकाशनबाद निरन्तर रुपसँ कैम्पसमे संगे पढबाक भरपूर भरोस देलियै । ओकर आँखि कने आश्वास्त आ चेहरा कने मुरुझाएलसँ फुलाएल देखाएल । दुनूगोटे नेहक बुन्नमे नहाइत- खेलाइत, फ्रुटीक चुस्की लैत फेर मड़बाँस बाहर अएलौ । साथ मे ओकरा डेरा छोड़ी हमहूं अपन डेरा पहुचलहुँ । प्रातः भेने ओ अपन पापासंग घर गेल बात फोन क’ बतौली ।
जिनगी एक नदीक अनवरत यात्रा छैक । एहिमे कखन कोनदिस कहिया उपटि जाइत छै आ कहिया कोम्हर धार बहए लगैत छै । कहब बड़ कठीन छैक । समयक अपत्कालीन चट्टानमे पड़की’ स्नातकके सपना करेजमे दफन करैत नेपालक सिमकार्ड तोरिक फेकैत जखन आबए पड़ैत छै ५० डिग्री बला देशमे । बहाब’ पडैत छै शोणितसंग पसेना तखन प्रेम, प्रेमिका आ पछिल्ला जवानीक खिस्सा अपनेआप स्मृतिसँ विलीन होबए लगैत छै ।जिम्मेबारीक बोधमे, दायित्वक बोझमे अतीतक बहुत किछु बिसरादैत छैक मनुखके । भूतक बहुतकिछु हेरादैत छैक मनुखके । एहि अनुरुप गमौने रही हमहूं अपन कैम्पसक साथी, मोनक मीत आ हृदयके सहयात्री उषा ढकालके । से नइँ जानि कोना पाँच बर्षक बाद आइ अच्चानक प्रकृतिक ई कोन रुप देखाएल ? कोन तरहे पछिला अतीत सामुन्ने आएल ? इहे-एहने बातसब गुन्धुन करैत निन्न भागिगेल अछि कोसो दूर…मोबाइलमे एलार्म बजलै… टिनिनि… टिनिनी… टिनिनी… हम मित्रसबके ड्युटी लेल उठबैत…अपना सुतबाक अनेरे प्रयास करैत रहलौ…


(आबद्ध अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य समाज कतार, स्वतंत्र लेखन, जनकपुरधाम, वर्तमान दोहा कतर)
bindeshwarthakur@yahoo.com