• २०७९ असोज २० बिहीबार

अनाम पीड़ा

नंदा पाण्डेय

नंदा पाण्डेय

आज फिर,
वही बेमौसम बरसात,
हवा के तेज झोंकों के साथ
पहले फुहारें, फिर
मूसलाधार बारिश

हमेशा की तरह
हवा में फिर वही जहरीली नमी
जिससे जंगली बबूल का रंग लाल हो जाता है

बरसाती नदियां
स्वभावानुसार हर-हरा कर बहने लगी हैं…
कुकुरमुत्ते सिर उठाकर खड़े हो गए हैं
बरसाती नदियों को देख,
पहाड़ भी अपना स्वाभाविक रंग
छोड़ कर
बरसाती नदियों के रंग में रंग गया है

बरसात का यह दिन
उसके लिए अब
उसकी जिंदगी का
वह केंद्र बन गया है
जिसकी परिक्रमा वह
सालों से करती आ रही है

वह घाव जिसको
उसने सूखने के लिए
खुला छोड़ रखा था
उसे इस जहरीली नमी ने
फिर से जगा दिया और अब
उसकी आंखें उसी घाव पर जमी हुई हैं

ओस जैसी धुंध
अब उसके चश्मे पर
जमने लगी है…
उसकी आंखें गगनचुम्बी पर्वतों
पर कुछ खोज रही थीं

अचानक एक प्यास जाग उठी
इतनी तीखी कि
उसे मिटाने के लिए
वह खूब रोए…ऐसा उसे लगा,

आज उसे एक अनाम पीड़ा सता रही है..!


(स्वतंत्र लेखन, मोरहाबादी रांची, झारखंड, भारत)
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