• २०७९ असोज १८ मङ्गलबार

कशमकश

डा. श्वेता दीप्ति

डा. श्वेता दीप्ति

आज घर खाली हो गया । पिछले पन्द्रह बीस दिनों से घर में जो चहल- पहल थी आज समाप्त हो गई । सभी रिश्तेदार लौट चुके । उनके बीच अपने चेहरे पर खोखली मुस्कान चिपकाए अपने सारे दायित्व का निर्वाह करती रही । वैदिक मंत्रोच्चारण और रीति- रिवाजों के बीच प्रिया बेगानी हो गई । ये रीत भी अजीब है, अपने ही कलेजे के टुकड़े को हम सहर्षता से किसी पराए के साथ विदा कर देते हैं । फिर जन्म देने वाले ही पराए हो जाते हैं और वह अजनबी अपना । कितना रोई थी प्रिया जाते समय । लेकिन उसे मजबूती के साथ सम्भाला था अमित ने और उसकी यह दृढ़ता मन को तसल्ली दे रही थी, लगा कि वह हमेशा प्रिया को यूँ ही सम्भालेगा ।
चश्मे के पीछे प्रकाश की आँखें भी नम थीं जिसे छुपाने की वो नाकाम कोशिश कर रहे थे । इन सभी भाग दौड़ के बीच मैं प्रकाश के चेहरे पर कुछ और भी खोजने की कोशिश कर रही थी । वह, जो मैं पिछले पच्चीस वर्षों से तलाशती रही हूँ । किन्तु, जो वर्षों में नहीं जान पाई वो आज कैसे जान पाती ?
कल उसकी इस दुनिया से दूर जा रही हूँ । दो महीने पहले मैंने उससे कहा था कि, ‘मैं यहाँ से जाना चाहती हूँ, आप भी तो यही चाहते हैं शायद इसलिए तो कहा था, ‘तुम्हें किसी ने नहीं रोका दुनिया बहुत बड़ी है जहाँ जाना चाहो जा सकती हो ।’ पर मैं उस वक्त जा नहीं पाई । लेकिन आज मैं कह रही हूँ कि अब और नहीं । कहते हैं ईश्वर ने सबके लिए कुछ न कुछ तय कर रखा है । कुछ अच्छा, कुछ बुरा । मुझे लगता था कि मेरे लिए सब अच्छा है क्योंकि ज्यादा कि चाहत नहीं थी । पर उतना तो चाहिए था जो सबको मिलता है । खास कर अपने साथी का प्यार । पर यहीं मेरी किस्मत हार गई । हर पल आपके साथ, आपकी आँखों में, आपकी खामोशी में खुद को तलाशती रही । पर एक आसरा था मेरे साथ, वो थी मेरी बेटी । अब तो उसकी भी अपनी जिन्दगी होने वाली है, उसके बाद ?’ आदतवश मैं अपनी बात कहती चली गई थी । आपने एक पल के लिए मेरी ओर देखा, उनमें कहीं कोई सवाल नहीं था, न प्यार, न शिकायत और न नाराजगी । यह अंदाज मेरे लिए नया नहीं था । एक समय था जब आपकी इस खामोशी पर मैं कड़वाहट से भर उठती थी, जी में आता था अपना सर फोड़ लूँ पर अब कोई कड़वाहट नहीं है । शायद आप बहुत अच्छे थे मैं ही उसे सहन नहीं कर पाई । मैं खामोश प्रतिउत्तर की आस में आपके सामने बैठी थी । कुछ क्षणोपरांत आपने कहा था, ठीक है प्रिया की शादी हो जाने दो । कमोवेश मैं जानती थी आपका यही जबाव होगा । ये दो महीने भी एक छत के नीचे उसी तरह गुजरे जैसे पिछले पचीस वर्ष ।
प्रिया चली गई । जाते–जाते उसकी आँखों में जो सवाल थे उससे मैं अन्जान नहीं थी, पर उसे नकार जरूर रही थी ।
तुमने पूछा था प्रिया, ‘माँ इतने वर्षों बाद ये फैसला क्यों ? आप कहाँ जाएँगी, अकेली कैसे रहेंगी और फिर पापा…?’
‘हम साथ थे ही कब प्रिया ?’  मैंने तटस्थ जबाव दिया था ।
‘हाँ, माँ मैं भी जानती हूँ, मैंने भी देखा है आपके बीच की दूरियों को, रातों को रोते, अपने आप पर खीझते । किन्तु ऐसा क्यों हुआ माँ ?’
मैं भी नहीं समझ पाई प्रिया कि मैं कहाँ चूक गई । हमारे सम्बन्धों में उष्णता कभी थी ही नहीं । अपने हर रिश्ते को मैंने ईमानदारी से निभाया, पर जिन्दगी के सबसे अहम् रिश्ते को ही मैं सम्भाल नहीं पाई । ऐसा नहीं है कि मैंने कोशिश नहीं की । कोई भी पत्नी अपने रिश्ते को खत्म होते नहीं देख सकती । पल–पल मैंने इस त्रास को झेला है । किसी भी रिश्ते को बचाना एकतरफा नहीं होता । मैं मानती हूँ कि कमियाँ मुझमें भी होंगी । मलाल तो इस बात का है कि कभी प्रकाश ने कुछ कहा ही नहीं । मैंने तुम्हारे पापा को जानने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैं उनकी खामोशी के किले को वेध नहीं पाई । मैं जान ही नहीं पाई कि वो मुझसे चाहते क्या हैं । मेरी मुखरता थी और उनकी खामोशी । हर बार मैंने पहल की पर…हममें कभी बातों का सिलसिला जुड़ा ही नहीं । हम बस औपचारिकता में सिमटते चले गए ।
अचानक मुझे लगा कि मैं थक गई हूँ । पता नहीं ये कौन सी थकान थी, एक अबुझ रिश्ते को झेलने की थकान या फिर अतीत को खंगालने की थकान । लम्बी साँस लेते हुए मैंने अपनी आँखें कस कर बन्द कर ली थी और कहा था, ‘आखिर हमने इतना लम्बा सफर तय कर लिया । अब तो तुम्हें भी अपने से अलग करने का समय आ गया । मेरी जिन्दगी तुमसे ही है प्रिया, तुम मेरे होने का कारण हो, मेरा आधार हो, तुम नहीं होती तो मैं नहीं जानती कि मेरा हश्र क्या हुआ होता । ईश्वर तुम्हें हमेशा खुश रखे । अमित की जिन्दगी बनो और सदा सुखी रहो ।’
अचानक तुम मुझसे लिपट कर रो पड़ी । रोना मैं भी चाहती थी । पर, गले तक आती कड़वाहट को मैंने निगला और उसकी पीठ को सहलाते हुए कहा, ‘प्रिया तुम हमारे बीच की कड़ी थी । अब जब तुम ही यहाँ नहीं होगी तो मेरे लिए यहाँ बचा ही क्या है ? अब इस घुटन को नहीं झेला जाता प्रिया । जहाँ तक तुम्हारे पापा का सवाल है तो, उनकी जिन्दगी में मैं कभी थी ही नहीं, इसलिए उन्हें मेरी कमी नहीं खलेगी । और फिर तुम भी तो इसी शहर में हो, अपने पापा का ख्याल रखना ।’ होठों को भींचते हुए मैंने अपनी आँखों को बन्द कर लिया ।
पर, ख्याल मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे थे । कल की ही बात लगती है, जब हर लड़की की तरह अपने दिल में असंख्य सपनों को सजाए मैं ब्याह कर कंकरीट के इस जंगल में प्रकाश के साथ आई थी । यहाँ ऐसा कुछ नहीं था जो मेरे सपनों से मेल खाता । नई जगह, नए लोग इनके बीच मैं अजनबी थी, प्रकाश नहीं । उस अजनबी माहौल में भी इनका भावनात्मक साथ नहीं मिला । अगर कुछ था तो इनके होठों से चिपकी इनकी खामोशी और एक लम्बी तन्हाई । जब भी इसे तोड़ने की कोशिश की नाकामी मिली । उन प्रगाढ़ क्षणों को भी मैं जी नहीं पाई, सब कुछ यंत्रवत् था । फिर प्रिया के आने की आहट मिली और इस आहट से मुझे मिली एक जिन्दगी । उसकी पहली आहट के साथ मन में यह आस भी जगी थी कि यह सेतु हमें मजबूती से जोड़ देगा । परन्तु उस नौ महीनों में भी प्रकाश की बेरुखी मेरे साथ रही । बच्चे की हर पहली हरकत मैं उससे साझा करना चाहती थी, उसे उस सुखद अनुभूति को बताना चाहती थी जो मैं महसूस कर रही थी । लेकिन मेरे साथ सिर्फ मेरा अकेलापन था । फिर प्रिया आई मेरी गोद में लगा सृष्टि का एक टुकड़ा मेरी गोद में मुस्कुरा उठा है । अस्पताल का वह कमरा मुझे आज भी याद है जब तुमने मेरा हाथ थामा, मैं अन्दर तक भीग गई थी । लगा मेरा अनदेखा वनवास खत्म हो रहा है । किन्तु यह भी क्षणिक था । प्रिया की प्यारी प्यारी हरकतों के साथ एक बार फिर जीवन ने गति ली । यहाँ भी प्रकाश प्रिया से तो जुड़े पर, मैं तब भी रिश्ते के दूसरे छोड़ पर ही खड़ी थी । चाह कर भी बीच की दूरी कभी खत्म ही नहीं हुई । रिश्ते के एक सिरे को थामने की कोशिश करती रही और दूसरा सिरा छूटता चला गया । कई बार लगा कहीं दूर चली जाऊँ पर प्रिया हमेशा मेरे सामने थी वो जंजीर बनकर जिसने हमें बाँध रखा था । कभी कभी सोचती हूँ कि क्या व्यक्ति का अहम इतना बड़ा होता है कि उसे अपनों का जलना भी नजर नहीं आता है ? अपनी खामोशियों और अहम के किले में जलता तो सामने वाला भी है फिर बेरुखी के दिखावे को हटा क्यों नहीं पाता ? या मेरे प्यार में वो तासीर नहीं थी जो उसे मुझसे जोड़ पाती । इसी कशमकश में पचीस वर्ष गुजर गए ।
इस निर्णय तक पहुँचना आसान नहीं था मेरे लिए, सबसे अहम् सवाल था मेरे सामने कि मैं जाऊँगी कहाँ ? प्रिया के साथ गुजारे कितने लम्हों का, मेरे अनगिनत आँसू, मेरी तड़प और कितनी ही बैचेन रातों का साक्षी है ये घर । क्या सचमुच इसे छोड़ना आसान होगा मेरे लिए ? मुझे लगा मैं डगमगा रही हूँ । नहीं । मुझे जाना ही होगा । मैं गाँव जाऊँगी । बाकी की जिन्दगी गाँव के छोटे छोटे बच्चों के बीच गुजारुँगी । उनकी मासूम जिन्दगी के बीच ही अब अपनी जिन्दगी की सार्थकता खोजूँगी । इस घर से मेरी प्रिया चली गई, अब मुझे जाना है । मैं अब कमजोर नहीं पड़ना चाहती, क्योंकि सच तो ये है कि आज भी प्रकाश की जिन्दगी से निकलते हुए कहीं न कहीं उसके प्रति कमजोर हूँ । अभी भी ऐसा लगता है कि एक बार सिर्फ एक बार वो मेरे करीब आकर कहेंगे, रुक जाओ रिया, मुझे तुम्हारी जरूरत है, मैं नहीं रह सकता तुम्हारे बिना । पता नहीं क्यों मुझे अपनी ही खुशफहमी पर हँसी आ गई ।
एक लम्बी निःश्वास के साथ मैं अपनी सोच को अपने सामान के साथ समेटने लगती हूँ । देर से सही अपनी जिन्दगी को एक नई राह पर ले जाने का मन बना चुकी हूँ । कल की सुबह इस कशमकश से हम दोनों आजाद होंगे ।


(डा. श्वेता दीप्ति त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य की उप- प्राध्यापक हैं)
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