• २०७९ असोज १६ आइतबार

मुक्तिबोध और ‘अँधेरे में’

डॉ.श्वेता दीप्ति

डॉ.श्वेता दीप्ति

वह कौन सी बात है जो किसी रचना या रचनाकार को कालजयी बनाती है, शायद उसके द्वारा रचित साहित्य की प्रासंगिकता ? हिंदी कविता का कोई कवि अगर पिछले ५० सालों के दौरान हर छोटी-बड़ी घटना पर बार-बार प्रासंगिक बनकर सामने आता रहा है तो वो हैं-गजानन माधव मुक्तिबोध । भरे विश्वास से मुक्तिबोध को सर्वकालिक महान रचनाकारों में शुमार किया जा सकता है । वजह केवल इतनी भर है कि उन्होंने जो भी रचा वह कालातीत हो गया । मुक्तिबोध की कालजयी कविता ‘अँधेरे में’ दरअसल उनके आत्मसंघर्ष तथा सामाजिक नग्न यथार्थ का चित्रण करती है । ‘अन्धेरे में’ मुक्तिबोध की अप्रतिम रचना है, शायद इसलिए प्रभाकर माचवे ने इसकी तुलना पिकासो की जगद्विख्यात चित्रकृति ‘गेर्निका’ के साथ की है । स्वत्व की खोज के लिए लिखी इस कविता में आधुनिक मनुष्य जीवन की आत्मा का इतिहास परिवेष्टित है । राजनीतिक षड्यंत्र, अवसरवादिता, पद-मोह, जनता के साथ छल, विश्वासघात इन सबके विरोध में कवि अकेला खड़ा होता है और धिक्कारता है-
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य-त्याग दिए,
हृदय के मंतव्य-मार डाले ।
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिए,
जम गए, जाम हुए, फंस गए,
अपने ही कीचड़ में धंस गए ।।
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गए .
भले ही मुक्तिबोध की कविताओं में कोई गीतात्मकता न हो, लेकिन उसमें एक आंतरिक लय है । वे सच्चे मायनों में जनता के लिए एक राजनीतिक कवि थे । मुक्तिबोध को पढ़ना वास्तव में अपने भीतर और बाहर एक लंबी यात्रा से गुजरना है । उन कविताओं को पढ़ते हुए आप अपने आपे में नहीं रहते, निकल पड़ते हैं उन कविताओं के साथ जंगल, पहाड़, अंदर, बाहर की यात्रा पर, अपनी पूरी संवेदनाओं के साथ । कभी गौर किया है आपने मुक्तिबोध की कविता पढ़ने के तत्काल बाद बहुत थकान महसूस होती है ? उस थकान की वजह यही यात्रा है । मुक्तिबोध के लिए कविता और जीवन अभिन्न थे । उनका समस्त साहित्य उस संवेदनशील रचनाकार की मार्मिक अभिव्यक्ति है, जिसने अपने युग-यथार्थ को बाह्य एवं आंतरिक दोनों स्तरों पर गहराई से महसूस किया । स्वाधीनता के बाद, देश जिस भ्रष्ट, शोषक और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के दंश को झेल रहा था । मुक्तिबोध अपनी कविताओं में उस व्यवस्था का असली चेहरा सामने लाते हैं और साथ ही उसमें व्यक्ति की अपनी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं । राजनीतिज्ञों, पूँजीपतियों एवं बुद्धिजीवियों की दुरभिसंधि के बीच मध्यवर्ग की उदासीनता जिस संकट को जन्म दे रही थी, मुक्तिबोध का साहित्य उसका विस्तृत वर्णन है । अपनी रचनाओं में ‘अभिव्यक्ति के खतरे’ उठाते हुए उन्होंने वस्तु और रूप के स्थापित ढाँचों को चुनौती दी । इसीलिए अपने समय में उनका साहित्य चर्चित होने के साथ-साथ बहुविवादित भी रहा और उसका समुचित मूल्यांकन उनके जीवन-काल के बाद ही संभव हो पाया ।

‘काव्यः एक सांस्कृतिक प्रक्रिया’ नामक निबंध में मुक्तिबोध ने अपने युग की परिस्थितियों और उसमें कवि की स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा-
‘आज का कवि एक असाधारण असामान्य युग में रह रहा है । वह एक ऐसे युग में है, जहाँ मानव सभ्यता संबंधी प्रश्न महत्वपूर्ण हो उठे हैं । समाज भयानक रूप से विषमता-ग्रस्त हो गया है । चारों ओर नैतिक ह्रास के दृश्य दिखायी दे रहे हैं । शोषण और उत्पीड़न पहले से बहुत अधिक बढ़ गया है । नोच-खसोट, अवसरवाद, भ्रष्टाचार का बाजार गर्म है । कल के मसीहा आज उत्पीड़क हो उठे है-मानव-संबंध टूट-फूट गये हैं । समाज में, शोषकों, उत्पीड़कों और उनके साथियों का जोर बढ़ गया है ।’

नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबन्ध पृ १४/१५
संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना को भीतर संजोने से ही कविता पूर्णता की ओर अग्रसर होती है । मुक्तिबोध उन रचनाकारों में से हैं, जिनके लिए व्यापक मानवीय उद्देश्यों के प्रति कवि की प्रतिबद्धता बहुत मूल्यवान है । उनकी कविता में व्यक्त संवेदनात्मक उद्देश्य इसी भावना के अनुरूप हैं । सभी कविताओं में एक प्रक्रिया अनिवार्य रूप से घटित होती है और वह है ‘आत्मग्रस्तता से आत्म चेतस’ होने की स्थिति । कवि अपने सम्मुख एक आदर्श रखता है-
कभी अकेले में मुक्ति न मिलती यदि वह है तो सबके ही साथ है ।

(चम्बल की घाटी में, चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृ २५३)
मुक्तिबोध की कविताओं में संवेदना का स्वरूप अति विशिष्ट है । ये कविताएँ एक भावात्मक बेचैनी से शुरू होती हैं लेकिन क्रमशः उनमें विचार की भूमिका दृढ़ होती जाती है । यहाँ आत्मसंघर्ष, केवल आत्मगत नहीं, वस्तु स्थिति के कारणों को रेखांकित करने की अदम्य आकांक्षा उस संवेदना को ज्ञान से जोड़ देती है । अपनी कविताओ में मुक्तिबोध संवेदना के इसी ज्ञानात्मक रूप के पक्षधर रहे हैं । उनके यहाँ ‘‘ज्ञान’ और ‘संवेदना’ एकांगी अवधारणाएं नहीं हैं । ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में उन्होंने ‘भोक्ता की संवेदना’ तथा ‘दर्शक के ज्ञान’ की बात कही । ज्ञान और संवेदना दोनों का संबंध हमारे चारों ओर व्याप्त वास्तविक जीवन से है, मनुष्य अपने जीवन में विभिन्न परिस्थितियों व क्षणों को झेलता है । इस अर्थ में वह उनका भोक्ता है । अनुभव की इस प्रक्रिया में वह अत्यंत मूल्यवान संवेदनाएँ अर्जित करता है किंतु, जब तक ये संवेदनाएं एकांगी हैं इनका कोई महत्व नहीं । परिस्थिति के ज्ञान, जीवन में प्राप्त शिक्षा-दीक्षा, विभिन्न प्रभावों और संस्कारों के संचित ज्ञान के अभाव में ये संवेदनाएँ हमारी दृष्टि को धुंधला कर सकती हैं । मुक्तिबोध मानते हैं कि संवेदना का ज्ञानात्मक होना जरूरी है अर्थात् संवेदना का ज्ञान द्वारा संयत और निर्दिष्ट होना आवश्यक है । इसी प्रकार, एकांगी ज्ञान भी जब तक कोरा, शुष्क, नीरस, और जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों की संवेदना से वंचित रहेगा तब तक मूल्यवान या उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकेगा ।

अन्धेरे में कविता में वास्तव में परिस्थिति का चित्रण प्रत्ययकारी शब्दों में कवि ने किया है । मधुतिष्ठति जिव्हाग्रे, हृदये तु हलाहलम जैसा आचरण करनेवाले हँसी का मुखौटा पहने दूसरों से द्वेष करने वाले कथित बुद्धिजीवी ही इस कविता का विषय है । समूह से स्वयं को अलग न मानकर समूह का हिस्सा, अल्पांश माननेवाले मुक्तिबोध अपने ही अन्तरंग में अपनी ही खोज करते हैं । सामाजिक दायित्व, खुली अभिव्यक्ति, यही इस कविता का विशेष है ।
मुक्तिबोध सही मायनों में जनवादी कवि थे, निहायत आम जीवन जीते थे । यही वजह थी कि आम आदमी के जीवन में उनकी गहरी रुचि और आस्था थी । संभवतस् इस जीवन ने ही उनको एक व्यक्ति के जीवन संघर्ष, उसकी वैयक्तिकता, उसकी असुरक्षा और अनिश्चितता से रूबरू कराया । ये तमाम चीजें जब उनकी आंतरिक बेचैनी से टकराईं, तो हिंदी कविता को एक से एक नायाब रचनाएं मिलीं, जिसने हिन्दी साहित्य के इतिहास में कई अनमोल पन्नों को जोड़ा । हिन्दी साहित्य सदी के इस कवि का हमेशा ऋणी रहेगा ।


(डा.श्वेता दीप्ति त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य की उप–प्राध्यापक हैँ)
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