• २०७९ असोज १७ सोमबार

चंद भाव अहसासों के

पुष्पलता ‘पुष्प’

पुष्पलता ‘पुष्प’

 

आज का ये मौसम,
ये फिजा
ये बारिश की बूंदें,
पेड़ों को छेड़ती ये ठंडी हवा,
ये पेड़ की डालियों से टूटकर
बिखरते अमलतास के ‘पुष्प’,
मानो मेरे बालो को
छू दिया हो तुमने
ये हवा में फूलों की
भीनी सी खुशबू,
जैसे मेरी सांसों को
महका दिया हो तुमने
ये अमुंवा पर
कूकती काली कोयल,
कहीं दो प्रेमियों के मिलन पर
संगीत छेड़ा हो किसी ने,
ये बारिश की बूंदों में भीगे
डाली पर झूलते गुड़हल के फूल,
ये मधुवंती की ‘पुष्पलता’ पर
झूलते गजरे,
हवा के हर झोंके पर
अपनी दिशा बदलते ये आम,
ये पक्षियों के चहचहाहट
मानों हमारे प्रेम की गाथा गा रहे हो,
ये सारे तुम्हारा
एहसास कराते हैं मुझको
की तुम यहीं हो ,
यहीं कहीं हो
मैं चाहकर भी
तुमको या
अपनी मुहब्बत को
शब्दों में नहीं बांध सकती,
तुम प्रकृति के हर रूप में हो
मैं अपनी कल्पनाओं के
विशाल सागर से
चाहे कितने भी भाव उठा लूँ
परंतु तुम्हारे प्यार को उन
‘चंद भाव’ में नहीं समेट सकती
कभी नहीं समेट सकती ।
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आऊ फर्कौं

तन्हाईयां