• २०८३ आश्विन १७, शनिबार

रुको ज़रा

अमलेन्दु नाथ मिश्र

अमलेन्दु नाथ मिश्र

भागते कहाँ हो तुम ?
रुको ज़रा-
परमशान्त बुद्ध से
पूछा उस क्रूर दस्यु ने ।

बुद्ध ने कहा-
रुका हुआ हूँ मैं,
भागते तो जा रहे हो तुम,
हिंस्र बनते जा रहे हो तुम ।

रक्त बहा रहे हो रोज,
चित्त मगर अशान्त है,
व्यर्थ ही यह दौड़ तुम्हारी,
कहाँ इसका अंत है ?

शत्रुभाव छोड़ो, हे जीव,
जीव पर दया करो,
दूसरों से युद्ध छोड़कर
पहले स्वयं पर विजय करो ।

कौन चाहता है मृत्यु ?
कौन चाहता है पीड़ा ?
समान भाव रखो सबमें,
ज्ञान को बनाओ जीवन-दीपक ।

जीवन में दुःख है यदि,
तो उसका उपाय भी है,
दुःख के कारण जानकर
सन्मार्ग को ग्रहण करो ।

वचन सुने जब बुद्ध के,
वह ठिठक गया वहीं,
हाथ से उसके शस्त्र गिरे,
शत्रुता रह गई नहीं ।

क्षणभर में शांत हुआ चित्त,
मिट गया मन का अंधकार,
बुद्ध के करुण वचनों से
बदल गया उसका संसार ।


अमलेन्दु नाथ मिश्र