आधी रात है सन्नाटा पसरा है ड़रते हम ।
बादल घने बारिश धीमे धीमे शीतल हवा ।
घर से दूर आँधियाँ आ रही है मन ड़रता ।
सड़क चौड़ी भीड़ खचाखच है चलना कैसे ।
अशोक बाबू माहौर