कविता
विक्रांत हाथ में शिकायती पत्र थामे उच्चाधिकारी के कार्यालय में दाखिल हुआ। सामान्य शिष्टाचार के बाद उसने उच्चाधिकारी से दावे के साथ कहना चालू किया,“ सर, आपका कार्यालय तो दलालों का अड्डा बना हुआ है । कोई भी काम कराने आइए तो कुछ दलाल पीछे लग जाते हैं और कहने लगते हैं कि इतने दिन के भीतर आपका काम हो जाएगा तथा बदले में इतने पैसे आपको देने होंगे ।“ विक्रांत की आवाज धीरे–धीरे इनकलाबी होती जा रही थी । उसने कहना जारी रखा,“ उनके पास हर काम की तर्कसंगत मूल्य सूची है । कोई कार्ड बनवाना हो या प्रमाण पत्र आने – जाने,खाने –पीने वगैरह का खर्चा जोड़वाकर कहते हैं कि इससे आधे खर्च में तो कागजात आपके घर पहुँचा दूंँगा।जन साधारण को इन लुटेरों से बचाना आपका धर्म बनता है, सर ! “ इसके बाद विक्रांत ने अपने शिकायती पत्र को उच्चाधिकारी के टेबुल पर रख दिया ।
उच्चाधिकारी ने पत्र पढ़ पान की पीक पीकदान में थूक मंथर आवाज में कहना शुरू किया,“ विक्रांत बाबू, मैं आपका पत्र पुलिस को अग्रसारित तो कर दूंँगा, परंतु आपसे एक अपेक्षा है कि आप उन तथाकथित दलालों के नाम भी इसमें जरूर लिखेंगे ताकि प्रशासन उन्हें पकड़ सके। फिर पुलिस आपको थाने पर जब–जब बुलाए तब – तब बिना हीला – हवाले वहांँ जाना होगा। कोर्ट भी जाना पड़ सकता है । फिर यह मत कहिएगा कि उस दिन हमें छुट्टी नहीं मिली या घर में किसी की तबीयत खराब हो गई या और कुछ । भ्रष्टाचार की कमर तोड़ने में आप जैसे जागरूक लोगों की सख्त जरूरत है। प्रशासन को आपसे यह उम्मीद है कि आप उसे जांँच में भरसक मदद करेंगे । और हांँ, यह भी ध्यान रखिएगा कि पुलिस आपको भी संदेहास्पद मान पूछ – पाछ कर सकती है, तो इसे अन्यथा न लीजिएगा । तो, यह पन्ना लीजिए और बाहर बैठकर चटपट तथाकथित दलालों के नाम सहित दूसरा शिकायती पत्र लिखकर दीजिए । तब तक मैं आपका इंतजार करता हूंँ ।“
विक्रांत के दुबारा भीतर नहीं आने पर उच्चाधिकारी उसे तलाशते हुए अपने कार्यालय से बाहर निकले। विक्रांत के कंधे पर हाथ रखते हुए उन्होंने कहा, “विक्रांत बाबू,मैं जानता हूंँ कि आप अच्छे आदमी हैं और आपकी नीयत भी अच्छी है, आपकी सोशल आडिट की भावना की मैं कद्र करता हूंँ, परंतु कानून को तो सबूत और गवाह चाहिए न । कुछ दिन का समय ले लीजिए। फिर हमसे मिलिए ।“
दिन पर दिन बीतते गए पर विक्रांत के लिए ’ कुछ दिन ’ कभी नहीं आया ।
अरिमर्दन कुमार सिंह
बक्सर (बिहार)