• २०८२ चैत्र ६, शुक्रबार

दरारों सी ज़िन्दगियाँ

संजय कुमार गिरि

संजय कुमार गिरि

शब्दाँकुर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित “दरारों सी ज़िन्दगियाँ” लघुकथा-संग्रह के रचनाकार अशोक बाबू माहौर समकालीन हिंदी साहित्य के ऐसे संवेदनशील साहित्यकार हैं, जिनकी लेखनी समाज के यथार्थ को गहराई से स्पर्श करती है। मध्य प्रदेश के मुरैना ज़िले में जन्मे अशोक बाबू माहौर समाज की नब्ज़ को पहचानने वाले सजग रचनाकार हैं। उनके इस लघुकथा(संग्रह में जीवन के विविध पक्षों, मानवीय संवेदनाओं, संघर्षों तथा सामाजिक विडंबनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है ।

“दरारों सी ज़िन्दगियाँ” शीर्षक अपने आप में जीवन की उन अनकही पीड़ाओं, टूटनों और परिस्थितियों का प्रतीक है, जो अक्सर हमारे आसपास मौजूद होते हुए भी हमारी दृष्टि से ओझल रह जाते हैं । लेखक ने अपनी लघुकथाओं के माध्यम से इन्हीं दरारों में छिपी पीड़ा, संघर्ष और आशा की किरणों को पाठकों के सामने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है।
इस संग्रह की लघुकथाएँ समाज में घटित सामान्य किन्तु गहन अर्थपूर्ण घटनाओं पर आधारित हैं । उदाहरणस्वरूप एक लघुकथा में दादी अपनी पोती मनोरमा की शिक्षा को लेकर अत्यधिक चिंतित दिखाई देती है। घर से बाहर पढ़ने जाने पर आने वाली संभावित कठिनाइयों और सामाजिक आशंकाओं के कारण वह उसकी पढ़ाई बीच में ही रुकवा देना चाहती है । यह प्रसंग समाज में अब भी विद्यमान उस मानसिकता को उजागर करता है, जिसमें बालिकाओं की शिक्षा अनेक भय और पूर्वाग्रहों के कारण बाधित हो जाती है ।

इसी प्रकार “कामवाली देवी” लघुकथा में शकुंतला नामक महिला एक ईमानदार और परिश्रमी कामवाली की तलाश करती है, परंतु उसके अत्यधिक कटु और झुँझलाहट भरे व्यवहार के कारण कोई भी कामवाली अधिक दिनों तक उसके घर में टिक नहीं पाती । अंततः जो कामवाली देवी उसे मिलती है, वह भी घर के कुछ कीमती सामान लेकर गायब हो जाती है । यह कथा मानवीय व्यवहार, विश्वास और सामाजिक यथार्थ के एक महत्वपूर्ण पक्ष को उजागर करती है ।

संग्रह में सम्मिलित अन्य लघुकथाएँ- मजबूरी थी, शरारती वंश, फिर वही डर, मेरी फ़िक्र मत कर, मेरी माँ भूखी है, मैं वैसे ही बदनाम हूँ, माफ़ कर दिया, आँखों में आँसू, महात्मा और इंसान, अम्मा की नींद, पुनिया बोली बापूजी, माँ की लाड़ली, मेरी बिटिया तथा प्यासा व्यक्ति- जीवन के विविध अनुभवों और संवेदनाओं का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं। इन कथाओं में पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता, सामाजिक विसंगतियों की पीड़ा, मानवीय करुणा और जीवन के संघर्षों की झलक अत्यंत प्रभावी ढंग से मिलती है ।

पुस्तक की भाषा सरल, सहज और संवादप्रधान है, जो पाठकों को सीधे कथा के परिवेश में ले जाती है । लेखक ने अनावश्यक विस्तार से बचते हुए अत्यंत सटीक और प्रभावशाली शैली में अपने कथानकों को प्रस्तुत किया है । लघुकथा विधा की यह विशेषता होती है कि वह उपदेश नहीं देती, बल्कि संकेतों और परिस्थितियों के माध्यम से पाठकों के मन में विचार और संदेश की एक गहरी छाप छोड़ जाती है। अशोक बाबू माहौर की लघुकथाएँ इस दृष्टि से पूर्णतः सफल कही जा सकती हैं ।

समग्र रूप से “दरारों सी ज़िन्दगियाँ” केवल जीवन के दुःख और संघर्षों का चित्रण मात्र नहीं है, बल्कि यह उन दरारों को पहचानने, समझने और उन्हें मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से भरने की प्रेरणा भी प्रदान करती है । यह संग्रह पाठकों को समाज की वास्तविकताओं से परिचित कराते हुए उन्हें संवेदनशील और विचारशील बनने की दिशा में प्रेरित करता है। निस्संदेह, यह लघुकथा-संग्रह हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए एक महत्त्वपूर्ण और पठनीय कृति है ।


कवि एवं चित्रकार -संजय कुमार गिरि