• २०८२ माघ २६, सोमबार

प्रेम का अनहद नाद है, राजर्षि की प्रेम कविताएँ

डा. श्वेता दीप्ति

डा. श्वेता दीप्ति

नियति तय करती है कि आप कब कहाँ किससे जुड़ते हैं और किससे, कब, कहां, कैसे आपका एक आत्मिक संबंध बन जाता है । ऐसा ही कुछ इस संग्रह से जुड़ते हुए मैंने महसूस किया । अरुण जी को कम समय में जितना मैंने जाना और उनकी इन कविताओं से मैं जिस तरह से आबद्ध हो पाई हूँ इससे इतना तो मैंने महसूस किया और जाना कि एक अति संवेदनशील और भावुक मन के कवि और सहज व्यक्तित्व हैं आप । मैं स्वयं को इतनी पारखी नहीं समझती कि किसी भी कृति की बहुत गहनता और सूक्ष्मता के साथ समीक्षा कर सकुँ या उसकी कमी कमजोरी को सामने ला पाऊँ । मुझे हमेशा लगता है कि एक लिखने वाला मन जब कुछ लिखना शुरु करता है तो वह शास्त्रीयता को सामने रख कर नहीं लिखता बल्कि उसकी कही–अनकही भावनाएँ वहाँ व्यक्त हो रही होती हैं । क्योंकि वह कुछ लिखने का सायास प्रयास नहीं कर रहा होता है बल्कि उसकी मन में उपजती भावनाएँ अनायास ही शब्दों के माध्यम से कोरे पन्ने पर अंकित होती जाती है । जिसे वह बाद में संवारने या सजाने का काम करता है । किन्तु यह भी सच है कि अधिक साज सज्जा कृत्रिमता का आभास पैदा करती है । अरुण जी की प्रेम कविताएँ इन कृत्रिमताओं से परे होकर पाठकों से सहज ही सामंजस्य स्थापित करती हैं । जहाँ हमें लगता है कि उनके रचित शब्दों में हम स्वयं को जी रहे हैं । प्रेम मानव मन अनगितन भावनाओं में से सबसे अधिक कोमल और प्रबल भावना है जो सृष्टि के कण–कण से हमें जोड़ता भी है और उससे प्यार करना भी सिखाता है । यह भावनाएं आपकी रचनाओं में सर्वत्र व्याप्त है ।

प्रेम की पहली अभिव्यक्ति अक्सर कविता में ढला करती है । जब हर युवा होता मन एक रुमानी और सतरंगी दुनिया में जी रहा होता है तो वो कभी–कभी तो उधार के शब्दों में स्वयं को व्यक्त कर रहा होता है तो कभी अपने खुरदुरे शब्दों में प्रेम की कोमलता भर रहा होता है । वो शब्द भले ही अनगढ़ होते हों परन्तु, व्यक्त भाव की परिधि अनंत होती है । इसलिए सहज शब्दों में कहूं तो कविता के बीज हम सब में होते हैं हाँ उनके अंकुरण की क्षमता कम या अधिक हो सकती है । और जब एक मासूम मन परिपक्व होता है तो वह अरुण की प्रेम कविताओं की तरह प्रभावशाली होता चला जाता है । कविता व्यक्तिगत संवाद की संभावनाओं को विस्तृत कर उसे सामाजिक संवाद में बदल देती है । कोई भी कविता कब ‘स्व’ अभिव्यक्ति की निजता से आरम्भ होकर निजता के परे चली जाती है, यह पता नहीं चलता । क्योंकि हम कवियों के शब्दों में स्वयं को तलाशना शुरू कर देते हैं और साधारणीकरण की यही प्रक्रिया उस कवि या लेखक की रचना को सार्थक कर जाती है । कोई भी कवि जब शब्दों से खेल रहा होता है, तो उसके दिलो दिमाग में उसकी भावनाएँ पूरी शिद्दत से उन शब्दों को अपना आकार देने में व्यस्त रहती है । उस वक्त वो शब्द और उससे जुड़ी भावनाएँ सिर्फ और सिर्फ रचियता की होती है लेकिन जब वह अपना आकार ले लेती है तो वह हम सबकी भावनाएँ बन जाती हैं । क्योंकि हम सब जीवन के अनेक रंगों से होकर गुजरते हैं । लेकिन इनमें से जो सबसे प्यारा रंग होता है वह है प्रेम का ।

“राजर्षि अरुण की प्रेम कविताएँ” से गुजरते हुए यही सोच मस्तिष्क में है कि आखिर प्रेम है क्या रु संभवतः पूरी जिन्दगी की परिभाषा, जो है तो सब है, वरना कुछ भी नहीं । प्रेम स्वतंत्रता का नाम है, जितना दिया जाए उतना ही बढ़ता है, जितना लुटाया जाए उतना ही इकट्ठा होता है । जब आप प्रेम में होते हैं तब आप स्वयं को विस्मृत कर चुके होते हैं । मूल रूप से प्रेम का मतलब है कि कोई और आपसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुका है । और ऐसे

में आपके पास जो भी है, आप उसे खो देते हैं –
जब भी मैंने चाहा तुम्हारी साँसों में जीना
तुम्हारी साँसें फैल गई मेरे पोर–पोर में
तुम ने चाहा मुस्कुराना मुझे महसूस करके

मेरा आह्लाद समा गया तुम्हारे पूरे अस्तित्व में । (राजर्षि अरुण की प्रेम कविताएँ)
अगर हम खुद को नहीं मिटाते, तो हम कभी प्रेम को जान ही नहीं सकते । अगर हम प्रेम में हैं तो हमारे अंदर का कोई न कोई हिस्सा मरना ही चाहिए । हमारे अंदर का वह हिस्सा, जो अभी तक ‘मैं’ था, उसे मिटना होता है, तभी

वह प्रेम होता है –
तुम्हारे मन का वो कोना होना चाहता हूँ मैं
जहाँ प्रकाशहीन सुरंग में तय किए
तुम्हारे पदचाप की दासतां दजऱ् है
कोटि–कोटि सूर्य की रोशनी बन
उस दर्द भरे तालाब को सुखा देना चाहता हूँ
जिसमें अहर्निश अवगाहन को तुम अभिशप्त रहे हो
उस वृत्त को मैं
सीधी रेखा बना देना चाहता हूँ
जिसने तुम्हें अनंत काल से आवृत कर रखा है
थकना मत, गिरना मत, म़ुड़ना मत
मैं तुम्हारे साथ हूँ । ९राजर्षि अरुण की प्रेम कविताएँ०

डरता हूँ मैं तब जब तुम
अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हो
उस अवस्था में तुम , तुम नहीं रहते
तुम्हारा पूरा अस्तित्व समाहित हो जाता है मुझ में
तुम्हारी ये पूर्णता
मुझे मेरी अपूर्णता का आभास करा जाती है । (राजर्षि अरुण की प्रेम कविताएँ)
बस यही प्रेम की परिभाषा है । जीवन में कई तरह के संबंध होते हैं, ये संबंध हमारे जीवन की बहुत सारी जरूरतों को पूरा करते हैं । इन सभी संबंधों में प्रेम किसी ना किसी रूप में अवश्य मौजूद रहता है । लेकिन जब प्रेम की बात हम एक आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में करते हैं, तो इसे खुद को मिटा देने की प्रक्रिया की तरह देखते हैं –
सोचता हूँ वह रेखा
स्वयं निर्मित है या फिर हमारे द्वारा सृजित

मानव–मन के इतिहास और अंतरतम को खंगालकर
विश्लेषित करना चाहता हूँ इसके कण–कण को
समझना चाहता हूँ इसके अस्तित्व की रूपरेखा
रेखांकित करना चाहता हूँ इसके गुणसूत्र की संरचना
आखिर किस काल–खंड में इसका उद्भव और विकास संभव हुआ
रोचक है यह जानना कि किसी अदृश्य की सत्ता
इतनी ठोस व मजबूत कैसे हो सकती है
मुझे नहीं पता इस खोज की यात्रा
मुझे किधर भटका ले जाएगी
या कि दूर ले जाएगी मुझे स्वयं से ही
हो तो ये भी सकता है कि
इस यात्रा में ही, भटकन में ही, खोज की प्यास में ही
परम तत्व आभासित हो जाए
वह रेखा स्वयमेव
पिघलकर विलीन हो जाए
और तब टुकड़े में बँटा हमारा अस्तित्व भी
पिघलकर आसमान हो जाए । (राजर्षि अरुण की प्रेम कविताएँ)

जब हम वाकई किसी से प्रेम करते हैं तो अपना व्यक्तित्व, अपनी पसंद–नापसंद, अपना सब कुछ समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं । यह अपने आप में एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, क्योंकि प्रेम बेशक खुद को मिटाने वाला हो पर यही इसका सबसे खूबसूरत पहलू भी है । हम सब मूल रूप से प्रेम की प्राप्ति की तलाश करते हैं, क्योंकि सामान्य प्यार हमें वह तृप्ति नहीं देता जो हमें प्रेम से मिल सकती है, बचपन में प्रेम का शुद्ध प्रवाह रहता है, एक बच्चा निश्चल प्रेम से भरा हुआ होता है, लेकिन धीरे–धीरे उसका प्रेम स्वार्थ भरे प्यार में बदलता चला जाता है, जिसमें कई तरह की शर्ते होती है, प्रेम से पूरी दुनिया बंधी हुई है । जैसे इस धरती में मौजूद समुद्र, पहाड़, वन, व्यक्ति, पदार्थ सब उसके प्रेम रूपी गुरुत्वाकर्षण से बंधे हुए हैं । प्रेम में भी वही गुरुत्वाकर्षण है जो हमें खींचता भी है और बाँधता भी है । अरुण जी की कविताएँ भी ऐसी ही हैं जो आपका अपनी ओर खींचती भी है और बांधती भी है । आपकी कविताओं में प्रेम के कई कई रूप देखने को मिलते हैं । इन कविताओं में प्रेम को पाने की लालसा है तो खो कर भी प्रेम को जीवित रखने की अभिलाषा भी कायम है –

मेरे कंठनाद से कब आहत हुए तुम
मेर पुकार और वेद की ऋचाओं में
कितना गुणात्मक फर्क नज़र आया तुझे
मैंने सुना था तुम पोर–पोर से सुनते हो
जब सारा वन तुझसे निकलकर तुझ तक ही पहुँचती है
तो फिर कहाँ खो गया हूँ मैं कणवत्
चलो मैं शून्य होकर देखता हूँ
मेरा इश्क़ मुझे मिलता है कि नहीं ।

संग्रह में प्रेम कई रूपों में व्यक्त हुआ है । यह प्रेम कहीं चिन्ता है, कहीं रोष है, कहीं समर्पण है, तो कहीं समग्र के लिए व्यग्रता है । जब कवि कहता है कि–

रात को नींद जब नहीं आती
तब तुम्हारा आना
बड़ा सुकून देता है
ओ बारिश १
लेकिन तभी तक जब तक
वह स्वर वह सुर, वह तरंग
झम–झम छन–छन पायल बन–बन
कानों में मिसरी घोलता रहता है
हल्के–हल्के पसर रहे ठंड में
रजाई के भीतर दुबके मन में
जैसे ही यह ख़याल आता है
कि छत तो कच्चा है
सच मानो प्रिय

रात को नींद तब नहीं आती । (राजर्षि अरुण की प्रेम कविताएँ)
बारिश आनंद देती है पर इसका आनंद भी उनके हिस्से है, जिनके मकान मजबूत होते हैं । सहज सी पंक्ति बहुत कुछ कह जाती है । अर्थात् आनंद भी सामर्थ्य के हिस्से में आती है ।
ऐसे ही जब समाज की बात आती है और आज के प्यार की बात आती है तो इनका रोष व्यक्त होता है–

प्यार को टुकड़े–टुकड़े काटकर
उन्हें जंगल में फेक आए तुम
जिसमें नाचते–गाते हएु तुमने
न जाने कितने प्रेम–पलों को जिया होगा
आखिर भाव की कौन–सी दशा होती होगी वह
जब भावों में रचे–बसे सब कुछ को
नोच–नोचकर फेंक दिया जाता होगा

कैसे उसे मैं प्यार लिख दूँ ? (राजर्षि अरुण की प्रेम कविताएँ)
संग्रह की कविताओं में समर्पण की भावना तो किसी ना किसी रूप में हर जगह व्याप्त है और अत्यंत ही प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त है । हर कवि की अपनी अलग शैली होती है और यही उस कवि की पहचान भी होती है । एक अच्छी कविता की शैली स्पष्ट, भावपूर्ण और आकर्षक होनी चाहिए, जिसमें प्रवाह, लय और उपयुक्त शब्दों का प्रयोग हो, साथ ही संवेदना और चित्रात्मकता भी झलके । अरुण जी की कविताएँ इन कसौटियों पर खरी उतरती हैं । साथ ही आपने प्रतीकों और बिंबों का भी अच्छा उपयोग किया है । अरुण जी की कविता में सहज शब्दों के अतिरिक्त संस्कृतनिष्ठ शब्दों का भी प्रचुरता से प्रयोग किया गया है । किन्तु यह प्रयोग कविता को दुरूह नहीं बनाती है बल्कि एक भावप्रवणता का सहज प्रवाह प्रसारित करती है ।

हम सभी जानते हैं कि कविता व्यक्तिगत भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का माध्यम है किन्तु यह वैयक्तिकता तब निर्वैयक्तिक हो जाती है जब कवि की प्रस्तुति से पाठक स्वयं को उससे आबद्ध कर लेता है और यह गुण अरुण जी की रचनाओं में नजर आता है ।

मुझे विश्वास है कि राजर्षि अरुण की प्रेम कविताएँ पाठक मन पर गहरा असर अवश्य छोड़ेगी । जिन्दगी की ख्वाहिशों को समेटती आपकी कविताओं में व्याप्त प्रेम, बिछोह, समर्पण और रिश्तों की व्यापकता हम सबकी है और हम में व्याप्त है इसलिए ये कविताएँ मन की कविता है, जग की कविता है और हर संवेदनशील आत्मा की कविता है ।


डा. श्वेता दीप्ति