• २०८० फागुन ९ बुधबार

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना

ऋतु पल्लवी

ऋतु पल्लवी

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है ।
पावस के पीले पत्तों को स्वर्ण रंग दे
हार बना निज स्वप्न वर्ण दे
वासंती सा मोह जगाना,मन को भाता है ।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है ।

व्यर्थ जूही-दल, मिथ्य वृन्द-कमल
केवल भरमाने को प्रस्तुत रंग-परिमल
इससे तो सुदूर विपिन में गिरे पलाश का मान बढ़ाना, मन को भाता है ।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है ।

गर्मी के आतप से जलती जेठ-दुपहर में
एक-एक कर तिनका चुनते, नन्हें से पंछी के संग में
छोटा सा एक नीड़ बनाना, मन को भाता है ।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है ।

हैं असीम आशाएं सबकी, सतरंगी सुख-स्वप्न सभी के
मनुज चाहता स्वार्थ सिद्धि हित, सारे मुक्तक भाग्य निधि के
इससे तो निस्पृह बच्चे की निश्छल इच्छा बन जाना, मन को भाता है ।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है ।

जुड़े कई निश्चित से बंधन इस जीवन में
कई हैं अपने रिश्ता-नाते, जग प्रांगण में
किन्तु किसी अंजान पथिक को अपना कहकर स्वयं मिट जाना, मन को भाता है ।
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है ।


ऋतु पल्लवी