• २०८१ असार १२ मङ्गलबार

वह रह गई अकेली

डॉ वन्दना गुप्ता

डॉ वन्दना गुप्ता

कुछ अलग करने की
चाह में
वह रह गई अकेली
हार मानना
स्वीकार्य नहीं था
उसे
टैगोर के गीत ने
झटका उसकी शिराओं को
वह बढ़ गई अकेले
राह में कुछ स्त्रियों ने की संगत
लीक से हटने खातिर
कुछ लौट गई
मर्यादा की दुहाई देकर
आधे रास्ते
उन्हीं पगडण्डियों से
जहाँ से आई थी वे
दलों में विभाजित
ये स्त्रियाँ फिर कहलाई
कुछ पतिव्रता
कुछ अपराजिता ।


डॉ वन्दना गुप्ता
सिलीगुडी, पश्चिमबंगाल, भारत