• २०८१ असार १२ मङ्गलबार

प्रेम अपनी जगह होता है

मनीषा कुलश्रेष्ठ

मनीषा कुलश्रेष्ठ

प्रेम अपनी जगह होता है
बाकि चीज़े अपनी जगह
गमले अपनी जगह
प्याले अपनी जगह
ड्रेसिंग टेबल पर
रखी
लगभग घिस गई
पेल रोज़ लिपस्टिक
अपनी जगह
भूली हुई चीज़े भी
रखीही रहती हैं
किन्हीं बहुत चौकस पलों में
कुछ ज्यादा ही संभाल कर
रखने और भूल जाने के बीच
तुम ही हो
जो बार बार
भूल जाती हो
कि
भई प्रेम अपनी जगह है
और
सार्वजनिक दायरे…….


मनीषा कुलश्रेष्ठ, जयपुर, राजस्थान