• २०८१ श्रावाण ५ शनिवार

तुम्हें देखा है

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

वर्षो बाद तुम्हें देखा है
नहीं, भूल हो गयी
शायद सदियों बाद देखा है
तन–मन कम्पित, जगी उमंगे
भीतर से आवाज उठी है
पहले से तुम भली लगी हो
वर्षों बाद तुम्हें देखा है ।

अधरों पर मुस्कान खेलती
वही अपनी–सी, भोली–भाली
जैसे कोई कुसुम–कली हो
अभी–अभी खिलकर निखरी हो
सजी–धजी उडती तितली हो
हाँ ! पुनश्च तुम्हें देखा है
वर्षों बाद तुम्हें देखा है ।

रूप रंग की छटा निराली
निखरी, सँवरी और सुनहली
आँखो को यह छवि भा गयी
उलझ गयाी हैं साँसे मेरी
मनमोहम तुम्हारी सूरत में
गुम हो बैठी सुध–बुध मेरी
फिर से आज तुम्हें देखा है
वर्षों बाद तुम्हें देखा है ।

नख–शिख तक ये यौवन तेरा
तन–मन को आल्हादित करता
ढली प्यार में कान्ति तुम्हारी
जग–मग सारे जग को करती
यह घायल पंछी मन मेरा
उड जाने पर अडा हुआ है
जब से मीत तुम्हें देखा है
वर्षों बाद तुम्हें देखा है ।

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)