• २०८० चैत ३० शुक्रबार

हे कृष्ण

प्रियांशी

प्रियांशी

हे कृष्ण मधुसूदन कैसे करूं तेरा बखान
भक्त भी तेरे जैसे महा रसिक – रस खान
अधरों पर सदा हो जिसके मंद मंद मुस्कान
रखा जिन्होंने रुक्मणी – द्रौपदी का मान
हे गरुड़ के इष्ट, श्रीधर तू
कभी मर्यादा पुरुषोत्तम तू
कभी तो तू लीलाधर
पुरुषों में पुरुषोत्तम तू
अनंत कोटि ब्रह्मांड का नायक तू,
परमानंद परम सुख दायक तू

हे कृष्ण विश्वरूप धरता
काल भी तुझसे डरता,
प्रह्लाद का कष्ट सहन न करता,
रावण का दहन भी तू ही करता
मेरा घनश्याम, नीलकाय तू
भक्तों के कामधेनु गाय तू
मंथन से निकला विष भी,
नीलकंठ का नील भी तू
राधा के वस्त्रों का नील भी तू
कृष्ण सा नटखट, राम सा शील तू

हे कृष्ण त्रिलोक का स्वामी तू,
जगन्नाथ, नयन पथ गामी तू
गोपियों का माखन चोर तू
हर पहर, साँझ – भोर तू
कालों का काल, महाकाल भी तू
रुद्र भैरव स्वयं, विकराल भी तू
धर्म का पालक और
अधर्म का संहारक तू
सूरदास के लोचन और
मीरा का सुख दायक तू

हे कृष्ण, किस रूप में तुझे देखू
निर्गुण निराकार, सबसे निर्विकार तू
हर रूप में अरूप है तू
पृथ्वी – आकाश, छाँव – धूप है तू
कण – कण में तू, क्षण – क्षण में तू
काली बन असुरों का करता भक्षण तू
तुलसीदास के घाव तू भरता
विभीषण को छाँव भी देता
बकासुर को जिंदा गाड़ा तूने
हिरण्यकशिपु को फाड़ा तूने

भीम की गदा भी तू
सत्य संग सदा ही तू
पांडवों की नींव तू
पार्थ की गांडीव तू
द्रौपदी के केश तू
स्वयं हृषीकेश तू
शिशुपाल का सुदर्शन बन अंत करो
लंका को जलाकर तुम हनुमंत बनो
अर्जुन जब भी हारे, गीता वाणी बनो
अर्जुन की जीत की कहानी बनो

लक्ष्मी की मंगल माला तू
युधिष्ठिर का है भाला तू
कंस के अत्याचार का अंत
और देवकी का उजाला तू
यशोदा का तू ग्वाला और
श्री को हरने वाला तू
है ललिता त्रिपुरा दुर्गा भी
और महिषासुर मतवाला तू
कदंब वृक्ष पर चढ़कर के
मटकी फोड़ने वाला तू

हे कृष्ण महायोगी गीता का सार तू
धर्म की जीत और अधर्म की हार तू
दुष्टों के संघार हेतु, संतों के उद्धार हेतु
जब तुझे समय गुहार लगाता है
धर्म स्थापना को तेरा प्रण तुझे
हर युग नए आकार में लाता है
।। संभवामि युगे युगे ।।


प्रियांशी, मुम्बई, भारत