• २०८१ श्रावाण ३ बिहीबार

बचपन

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

निर्मल, निश्छल
पाक पवित्र
अपने पराये के भावों से
रहित सहज सुख से
सराबोर बचपन

हँसी- खुशी का खजाना
भूतकाल की पीडाएँ और
भविष्य की आशंकाओं
से अनभिज्ञ, मुक्त
प्यारा सा बचपन
धूल, धसरहित तपस्वी
खेत की यज्ञशाला में
संकल्पित किसान
ढूँढता अपना खोया हुआ
अभावग्रस्त बचपन
अभिशाप है बडा होना
और बडा दिखने की लालसा
नहीं सुहाता, नहीं जँचता
न ही पचा सक्ता है
इस पत्थर जैसे भाव को
एक अबोध बचपन
बहुतों के भीतर
बसता है और
अकडता भी है
किन्तु खलता है
बनावटी, दिखावटी
भारी- भरकम अनगढ
उदासीन, अकेला
तडपता बचपन ।

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)