• २०८० असोज ७ आइतबार

सुधियों की तितली

डा. मधु प्रधान

डा. मधु प्रधान

आ कर बैठी
खिड़की पर
सुधियों की तितली
नर्म–नर्म पंखों से फिर
मन को सहलाया है
धुंधली होती तस्वीरों में चमक भर गई
थकी- थकी साँसों में मृदु गमक भर गई
मीठी- मीठी
बातें कर
फिर से बहलाया है
चटक हो गई दरवाजे पर अंकित रंगोली
हँसी दुध मुंही ,चंचलपग अरु तुतली सी बोली
माटी की
सोंधी सुगंध ने
घर महकाया है
वह अम्मा का कान पकड़ना बापू की सख्ती
आँख बचा कर, कर लेते थे थोड़ी सी मस्ती
घटा उमड़ आई
आँखों में
मन भर आया है


डा. मधु प्रधान ,कानपुर, उत्तरप्रदेश, भारत