• २०७९ माघ २४ मङ्गलबार

प्रेम प्रतीक्षा

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

बहुत इन्तजार किया, और अभी करूँगा
करता रहूँगा
टकटकी लगाए अपलक
क्योंकि मैं यह जानता हूँ
कि इन्तजार करना ही मिलन का उत्कर्ष है !

यह कैसी सुरक्षित भावभूमि है मिलन की
जहाँ थोडा भी भय नहीं बिछडने का ।

वक्त नदी की तरह बहता जा रहा है
मैं देखता जा रहा हूँ निरीह किनारे पर खडे होकर !
पार करने के बाद भी कभी–कभी ऐसा लगता है कि
मैं पार नहीं कर सका हूँ,
बीच मझधार में हूँ
थम–सा गया हूँ,
हालातों से टकराकर लहूलुहान हो गया हूँ
कई युग बीत गए तुम अभी भी खडी हो उसी तरह
बिना हिले–डोले, किसी मूरत–सी
उसी तन्मयता के साथ उम्र की सीढियाँ चढते हुए
मैं भी जी रहा हूँ अपनी जिंदगी ।

तुम हिमालय ! नित्य स्नान के बाद
ऐसे ही खडी रहो
टप–टप टपकाता पानी,
थोडा सा शर्माते हुए
मैं तुम्हें देखता रहूँ
तुम में ही खोया रहूँ
रश्मियों के पारदर्शी आँचल से तुम्हारी लाज को ढककर !

साभा: चाहतों के साये में


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं)