• २०८० चैत ३० शुक्रबार

कन्या भ्रूण हत्या

सुषमा दीक्षित शुक्ला

सुषमा दीक्षित शुक्ला

ऐ ! जगवालों ये दर्द हमारा,
रो रो कर तुम्हे सुनाती हूँ ।

गर्भस्थ शिशू कन्या निरीह,
संसार त्याग मैं जाती हूँ ।

ऐ ! मानव तू तो दानव है
केवल अधिकार तुम्हारा क्या ?

तूने क्यूँ  मुझको मार दिया,
था मैंने तेरा बिगाड़ा क्या ?

गर्भस्थ शिशू की हत्या कर
तूने कितने अपराध किये ।

मैं दुनिया को ना देख सकी,
पापी तूने क्यों घात किये ।

मैं वापस प्रभु के पास गई,
उनके चरणों मे शरण लिया ।

फिर परमेश्वर से भेंट हुई,
मेरी पीड़ा का श्रवण किया ।

मैं दुनिया मे जा तक ना पायी,
ऐसा मुझ पर था वार किया ।

बहु असह वेदना दर्द दिया
आने से पहले मार् दिया ।

इंसा कहलाते सर्व श्रेष्ठ,
पर कैसा ढोंग रचाते हैं ।

इतनी नफरत धोखा तो,
वो पशु भी नही रचाते हैं ।

ये कैसी तेरी दुनिया है,
अब प्रभु से मुझको कहना है ।

ना जनम मिले अब धरती पर,
उस जग मे अब ना रहना है ।

ऐ जग वालों ये दर्द हमारा,
रो रोकर तुम्हें सुनाती हूँ ।

गर्भस्थ शिशू कन्या निरीह,
संसार त्याग अब जाती हूँ ।


सुषमा दीक्षित शुक्ला
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