• २०८० जेठ २१ आइतबार

अधूरा श्रृंगार

दिव्या सक्सेना

दिव्या सक्सेना

उसने चुना लम्बे समय तक
अधूरा श्रृंगार करना
उसने दोनों हाथों में मेहंदी लगाई
मगर लिखा नहीं कभी किसी का नाम उस पर
उसने लगाया महावर
दोनों पैरों की एड़ियों पर
मगर नहीं मिलाई लकीरें
दोनों ओर से कभी भी
उसने बिंदी सजाई प्रतीक्षा की
अपने मस्तिष्क पर
और उसने बचाऐं रखी हया भी
अपनी आँखों में
उसने सहेज कर रखा सम्मान बरसों से
अपने मन की दहलीज पर
हाँ उसने चुना लम्बे वक्त तक
अधूरे श्रृंगार में रहना
क्योंकि ब्याह केवल चुनाव मात्र का नहीं
अपितु स्वीकृति का भी विषय है
और स्वीकृति तो आधार है,आस्था है, विश्वास है
उस एक के प्रति जो पूरक हो उसके लिए
फिर स्वीकृति चाहे पूर्व में दी हो
या पश्चात में
महत्वपूर्ण इसमें श्रृंगार की
सार्थकता और पूर्णता भी है
वरना तो इसे ढोना मात्र है जीवन भर के लिए ।


दिव्या सक्सेना, दिल्ली, भारत