• २०८१ असार ३२ सोमबार

कतरा-कतरा

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

अंधेरा टपक रहा है कतरा- कतरा !
मन में रात घर कर रही है कतरा- कतरा !
जाने उजाला कहाँ है ?
मृत्यु बढ रही है कतरा- कतरा !

तारों के फूल बादलों में मुरझा गए
प्रेम के गीत बस वैसे ही विलय हो गए
टपक रहा हूँ आँसू बनकर कतरा- कतरा !
प्रिय !
मैं यह जानते हुए भी किं तुम नहीं आओगी
कर रहा हूँ इन्तजार
टकटकी लगाए कतरा- कतरा !

हाय !
हमारे वो दिन कितने रंगीन थे
वो रातें कितनी हसीन थीं
मगर आज सब खत्म हो गए देखते- देखते
न कोई खत, न कोई मुलाकात
न कहीं कोई इशारा, फिर भी करता है यह मन
तेरा इन्तजार, आँसू बनकर कतरा- कतरा !

जब तुम आती हो बहारें आती है
क्षितिज रोशन हो उठता हैं
मैं चला मी जाऊँ तो कोई गम नहीं
किसी को कोई मलाल नहीं
शीतलता हँसेगी कतरा- कतरा !


साभार: चाहतों के साये मेंं
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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)