• २०८१ असार २ शनिवार

निर्मल होती आँखें

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

नहीं मिटेगा
जिसे मैं अदृश्य में पाता हूँ
आँसुओं से पवित्र हुई आँखें
वियोग में भी संयोग देखती हैं ।

तुम्हारे हमारे बीच के वियोग की रेखाओं में
शून्य खूबसूरत कविता लिखता है ।
धन्य है विछोड !
जहाँ मेरा मैं सरस जिंदा रहता है
बलिदान के साथ – साथ विरत्व देता है ।

तृप्ति का आनन्द उसे ही मिलता है
जो समर्पण की अटल गहराई को छूता है ।
बेहिसाब होना मी,
मोहब्बत का खूबसूरत हिसाब है
असल में बात तो जीना है
जीना, रस पीना है ।

निरस ही सही मैं सरस सासें लेता हूँ
तुम्हारी मोहब्बत वह छाँव है
जहाँ आग से ही
मैं जीवन के भ्रम पालता हूँ ।

प्रेम के सागर में डुबमी लगाने के बाद ही जाना
कि मेरी मोहब्बत में शायद कोई खोट है
जिसे आज तक मैंने अपनी खुसी माना
वह तो दिल पे लगी चोट है ।

साभार: चाहतों के साये में


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)