• २०८१ बैशाख ८ शनिवार

गुमहो जाती है

प्रतिभा राजहंस

प्रतिभा राजहंस

ट्रेन जब चलती है
अपनी मंजिल की ओर
एक स्टेशन से दूसरे को
पार करती हुई
लेट होती है
बहुत बार
लेटलतीफी के कारण
झिड़की भी जाती है
अनेक बार
अनेक बार लेट ट्रेन
की उपाधि पाती हुई
भी कैसे तो
मंजिल पर
पहुँच जाती है स-समय
कैसे कर पाती है
ट्रेन यह ?
बड़ा जादुई लगता है
ट्रेन पिछले गलत को सुधारती है
मेकअप कर लेती है
और पाजाती है
हमसे- आपसे
यह पुरस्कार
बड़ी जादुई है यह
हम जीवन में
ऐसा कोई जादू
कभी क्यों न
कर पाते हैं
छूटे को, गलत को
क्यों न सुधार पाते हैं
क्यों न हासिल
कर पाते हैं
सबसे पुरस्कार ?
दो पहियों पर
चलती ट्रेन
जैसी ही तो है
यह जिंदगी
सुख- दुख के
दो पाटों के बीच
चलती हुई
डरती- झिझकती- तनती
अनवरत चलती हुई
कभी पिछडती
कभी लपककर
बढती हुई
पा जाती है
कभी पुरस्कार
कभी केवल दुत्कार
और कभी कहीं
अचानक ही
थमजाती है
हो किंकर्तव्यवि मूढ़
रहस्य कितना है गूढ़
नहीं समझपाती मैं
बहुत घबराती मैं
ट्रेन और जिंदगी
एक- सी होकर भी
अलग- अलग हो जाती है
दो पटरियों पर चलती हुई
ट्रेन तो पहुचती है, पर
दो पाटों के बीचकी
जिंदगी गुमहो जाती है
कई कई बार ।


प्रतिभा राजहंस
तिलका, माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर