• २०८१ असार २ शनिवार

तुम्हारा मेरा वह अतीत

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

तुम और मैं
जवान थे
तुम खूबसूरत थी
परी थी, स्वर्गंगा थी ।
तुम्हारी और मेरी जिंदगी की राहें
स्वप्न यात्रा जैसी थीं ।

मेरे चिढाने से
तुम लाजवंती हो जाती थीं
तुम्हारी मुस्कानों में मैं खो जाता था !
एक दूसरे में खोकर
हम एक दूसरे को पा लेते थें !

वहाँ जो तुम किया करती थीं
और जो मैं किया करता था
या फिर जो करने को साचकर नहीं कर पाते थे
हाय! कैसा अलौकिक संसार था वह हमारा !
तुम ही मैं, मैं ही तुम
कैसा जादूमय अहसास !
प्रेम की रिमझिम बरसात !

संगम भी कितना पावन जैसे हो हवन यज्ञ का
और हम समाधि के उत्कर्ष को सहज ही छूते थे !
प्रेम जो समझकर नहीं किया गया था
शायद वही था शाश्वत प्रेम
तुम्हारे और मेरे बीच उत्पन्न हुआ !

साभार: चाहतों के साये में


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)