English Poem
पूछते हो जमीर क्या है
गर्वीले हिमालय को देखते हो
जो सिर उँचाकिए
सीना ताने खडा है
और अपने बडप्पन का आभास दिलाता है
ऐसा दीखता है मानो सारे का सारा
आकाश उसने अपने कंधे पर टेक रखीहो
लेकिन क्षण भर को जरा सोचो तो सही
अगर जरा सी जमीन अपनी जगह से खिसक जाए
तो समूचे का समूचा हिमालय कहाँ चला जाएगा
पताही न चले कि वह कहाँ जाएगा
यही है जमीन का जमीर
डा. अहिल्या मिश्र, हैदराबाद
वरिष्ठ साहित्यकार