• २०८१ बैशाख ८ शनिवार

ग़ज़ल

पुष्पलता 'पुष्प’

पुष्पलता 'पुष्प’

जैसे भी हो साथ निभाना सीख लिया
मैंने उसके नाज़ उठाना सीख लिया

गैरों में भी जाना आना सीख लिया
अपने से ही हाथ बढ़ाना सीख लिया

जो समझे ना उनको क्या समझाती मैं
उन लोगों पे वक़्त गवाना सीख लिया

  • कोरोना में मरते देखा अपनों को
    तब से मैंने पेड़ लगाना सीख लिया

कब करता है कोई किसको याद यहाँ
अब हमने भी उन्हें भुलाना सीख लिया

मैं हर दिन डर के साये में जीती थी
अब मैंने आवाज़ उठाना सीख लिया

मैं अकसर जब खाली खाली रहती थी
लिख के गज़ले दिल बहलाना सीख लिया


(संगीत शिक्षिका, लेखिका, कवियत्री, नई दिल्ली ।)
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