• २०८० फागुन २१ सोमबार

दिलदार देहलवीके दो हिन्दी गजल

राजेन्द्र सिंह अरोरा

राजेन्द्र सिंह अरोरा

१. गजल

हादसे, तूफ़ान, हर मुश्किल भुलाना लाज़मी है
मर्द हो तो दर्द सह कर मुस्कुराना लाज़मी है

ऐसा लगता है कि अपने देश में सब सो रहे हैं
दोस्तो, ख्नतरा है, इन सब को जगाना लाज़मी है

ज़िंदगी में हौसला रख कर ही जी सकते हो प्यारे
मुश्किलें आएं, उन्हें आसां बनाना लाज़मी है

इक तरफ़ तहज़िब है तो दूसरी जानिब है हुस्न
सक्त उलझन में हूं दिल को भी मनाना लाज़मी है

शायरी हो, प्यार हो, इंसानियत या रात काली
रौशनी के वास्ते दिल को जलाना लाज़मी है

दोस्ती, उल्फ़त, वफादारी कई रिश्ते हैं लेकिन
क्या निभाने के लिए खुद को मिटाना लाज़मी है

खून के आंसू रुलाती है हमें दिलदार फिर भी
ज़िंदगी के साथ हर पल मुस्कुराना लाज़मी है

२. गज़ल संग्रह “सूरज का ख्वाब है“ से

यार, तूने तो इंतिहा की है
सोच ले ज़िंदगी खुदाकी है

आग आकर बुझाई गैरों ने
मेरे यारों ने तो हवा की है

उसका चेहरा न देख पाओगे
हुस्न में रोशनी बला की है

यह तो बतला कि तूने मेरे लिए
मुद्दतों बाद क्यों दुआ की है

जुल्फ चेहरे से दूर ही रखिये
चाँद पर किस लिए घटा की है

दुश्मनों का सहारा है दिलदार
दोस्तों ने तो बद दुआ की है


राजेन्द्र सिंह अरोरा, (दिलदार देहलवी) भारत
[email protected]