• २०७९ असोज १६ आइतबार

सदा सुखी रहो बेटा

सुषमा दिक्षित शुक्ला

सुषमा दिक्षित शुक्ला

रिटायर्ड इनकम टैक्स ऑफिसर कृष्ण नारायण पांडे आज अपनी आलीशान कोठी में बहुत मायूसी महसूस कर रहे थे, क्योंकि उनकी दो हफ्ते से बीमार पत्नी सुलोचना की तबीयत आज कुछ ज्यादा ही खराब लग रही थी, और ऊपर से आस्ट्रेलिया में नौकरी के कारण जा बसा इकलौता बेटा रंजन उर्फ बबलू पिता के बार-बार फोन करने पर भी फोन नहीं उठा रहा था ।
कृष्ण नारायण पांडे अजीब कशमकश में इधर से उधर चहलकदमी कर रहे थे । वह अपनी बीमार पत्नी को लेकर अत्यंत चिंतित थे ।
रंजन की बुजुर्ग मां की स्थित सही नहीं थी वह अपने पति से बार-बार अपने आंखों के तारे बबलू को देखने की इच्छा जता रही थीं । उन्हें लग रहा था कि वह बहुत जल्द परिवार से, संसार से विदाई लेने वाली हैं ।
सुलोचना की साँस की बीमारी तो पुरानी ही थी परन्तु इस बार कई दिनों से तबियत ठीक नही हो पा रही थी बल्कि अच्छे डा‘क्टर के इलाज के बाबजूद सुधार नही हो सका ।
अनहोनी की आशंका से उनके आँसू थम नहीं रहे थे । वह सोच रहीं थी कि उनके बाद उनके पति का ख़याल कौन रखेगा ।
बीमार पत्नी की दशा देख बेचारे बुजुर्ग कृष्ण नारायण भी अत्यंत दुःखी थे ।
तभी अचानक सुलोचना पूरी शक्ति लगाकर बड़बड़ाई…बबलू….ओ बबलू …।
फिर चुप हो गई …उसके बाद पति से कहा, सुनो जी वीडियो का‘ल से ही बेटे को दिखा दीजिए मुझे उसकी याद बहुत आ रही है । कृष्ण नारायण जी ने वीडियो का‘ल लगाया लेकिन अफसोस ..का‘ल रिसीव नहीं हुई । वह बेहद मायूस होकर अपनी पत्नी को ढाँढस बंधाने लगे, कि कहीं बिजी हो गया होगा, शाम तक तो फोन उठा लेगा, तुम परेशान मत हो, ठीक हो जाओगी ।ऐसा कहकर कृष्ण नारायण ने डा‘क्टर को फोन लगाकर अपने घर आने का निवेदन किया ।
तभी सुलोचना बोली, सुनो जी ऐसा लगता है कि अब तो तुम्हें अकेले ही रहना होगा शायद मेरी विदाई का वक्त जो आ गया, मेरी तबीयत जवाब दे रही है ।सुनो ..मेरी अलमारी में पुराना सीतारामी हार रखा है, वह बहू को मेरी अंतिम गिफ्ट के रूप में दे देना और जब बबलू आए तो उसे मावे की कचौड़ी बनाकर जरूर खिला देना, जो उस दिन मैंने तुम्हें बनानी सिखाई थी… क्योंकि बबलू हमेशा घर आकर मेरे हाथ के मावे की कचोरी ही मांगता है और कहना…मां बहुत याद कर रही थी और कहना… वह आपको अपने साथ ले जाए या यहीं अपने देश में कोई जा‘ब कर ले और हां यह भी कहना कि…!! कहते कहते अचानक सुलोचना की आवाज थम सी गयी, उनके अधूरे लब्ज हवा में खो गए ..!!
जब तक डा‘क्टर साहब पहुँचे सुलोचना अनन्त राह पर चली गईं थीं ।
बेचारे बुजुर्ग कृष्ण नारायण पांडेय ने अपनी बीमार पत्नी को, परदेसी पुत्र के वियोग में मरते देखा था, वह अत्यंत दुःख से विलाप करते करते गश खाकर गिर पड़े…!!
उधर आस्ट्रेलिया में अगले दिन कृष्ण नारायण और सुलोचना के आँखों के तारे, बुढ़ापे के एक मात्र सहारे, रंजन ने मोबाइल पर अपने पिता का मैसेज पढ़ा…बेटा तुम्हारी मां का अंतिम संस्कार हो चुका है ‘तुम्हारे लिए कल उनका एक संदेश जो अधूरा रह गया था….वह भेज रहा हूं…सदा सुखी रहो बेटा ….!!


सुषमा दिक्षित शुक्ला ( भारत)
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