• २०७९ असोज १६ आइतबार

दो गजलेँ

डा अनुराधा ‘ओस’

डा अनुराधा ‘ओस’

एक
सब कुछ नया है, कुछ भी पुराना नहीं रहा ।
मैं रह गया हूँ, मेरा ज़माना नहीं रहा ।

सूखा हूँ जब से, शाखा पर आता नहीं कोई,
अब मैं किसी का ठौर- ठिकाना नहीं रहा ।

कुछ इस तरह से खो गया मुझमें मिरा वजूद,
मेरा फ़साना, मेरा फ़साना नहीं रहा ।

पढ़ने लगे हैं लोग मिरे चेहरे पर तुझे,
अब मेरे बस में कुछ भी छुपाना नहीं रहा ।

उसमें भी आ गया है ज़रा-सा सयानापन,
मैं भी तो पहले जैसा दीवाना नहीं रहा ।

इक उम्र काटनी है, सो काटेंगे तेरे बाद,
जीने का यूँ तो कोई बहाना नहीं रहा ।


(डा ओस हिन्दी की चर्चित कवि हैं)
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