• २०७९ असोज १९ बुधबार

कल्पना का सागर

अंशु कुमारी झा

अंशु कुमारी झा

छोड देना चाहती,
कल्पना के सागर में
गोता लगाना,
भूला देना चाहती,
उस गन्थन- मन्थन
की सीपी से,
मोती निकालना ।

बेफिजूल लगने लगा,
वह आत्मभार और वह तनाव,
जिसको चिन्तन कर
होता रहा हृदय पर आघात,
उसमें नहीं रहा कोई भाव ।

छोड देना चाहती,
उस प्रतिबिम्ब के,
पीछे दौडना,
जो लाख कोशिशों
के बाबजूद पाना है कठिन,
रोक लेना चाहती खुद को
उस गड्ठे में कूदने से,
जहाँ का पानी है मलिन ।

तैरना नहीं अब रेत पर,
नदी का भ्रम लेकर,
कृत्रिम रूप से खिलना नहीं,
कागज का फूल बनकर,
स्वतन्त्र हो नभ में
ऐसे उडें,
जैसे हो कोई,
आशावादी परिन्दा,
अपने जज्बात और प्रण को,
दिल में रखकर,
हमेशा जिन्दा ।।।


( झा स्वतंत्र लेखिका हैं ।)
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