• २०७९ असोज १९ बुधबार

२६ मई

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

समुद्र की लहरें अपनी ही गति से आ-जा रही थीं । दूर कहीं क्षितिज में मद्धम धूप अपने दिन का सफर तय कर रही थी । पीले और लाल रंग से मिश्रित सूरज का गोला जिसमें चमक तो कम हो गई थी किन्तु उसकी ताप अब भी बरकरार थी । धूप की ताप के अवशेष के साथ किरणों में उलझे हुए बादल ऐसे लग रहे थे, मानो किसी भव्य देश का नक्शा उकेरा गया हो । साँझ होते इस समय में दूर-दूर से पक्षियों के झुंड अपने-अपने घोसलों की ओर लौट रहे थे । क्षितिज से अलसाया अंधेरा उतरने लगा था । कुछ देर पहले तक समन्दर के किनारे लोगों की जो भीड़ थी वो अब कम होने लगी थी । मानस-शोर के कम होने के कारण पानी में मछलियों की छपाक-छपाक की आवाज सुनाई दे रही थी, जो वातावरण को रहस्यमय बना रही थी ।
गरमी के मौसम में शाम गुजारने के लिए अक्सर लोग समन्दर के किनारे आते हैं । दूर स्थित पहाड़ों के घने जंगल उबासी लेते नजर आ रहे थे । विराट आज सुबह से ही समन्दर के किनारे आकर बैठा हुआ था । सुबह जब आया था तो किसी फिल्म के हीरो की तरह दिख रहा था, उसके हाथों में एक छोटा पर भारी बैग था । उसने समन्दर की ओर मुस्कुरा कर देखा मानो उससे कुछ कह रहा हो और वहीं पास के बेंच पर बैठ गया । सूर्योदय की कोमल किरणें  फैलती गईं, शीतल हवा में गरमी बढ़ने लगी थी, सूरज धीरेधीरे सर पर चढ़ने लगा पर विराट उसी तरह बैठा रहा जैसे किसी खोई चीज की तलाश हो या मानो किसी चलचित्र को देख रहा हो । बैठे-बैठे उसने पहले एक चाकलेट निकाला और वहीं पानी के पास रख दिया, फिर दिन चढ़ने के साथ ही स्नेक्स, कोक और फिर शराब और सिगरेट, इसके साथ ही दिन गुजारा । इस बीच उसने एक बार भी समन्दर के किनारे उपस्थित किसी भी व्यक्ति की ओर नहीं देखा, बस समन्दर के समक्ष अपनी मौन बातें रखता रहा । खुद में उलझा रहा और फिर नशे में चूर उसी बेंच पर सो गया । रात गुजर गई, सुबह की शीतल हवा ने उसे उठाया । आंखों को मलते हुए वह उठा और इधर-उधर देखा । उसे किसी से कोई लज्जा नहीं आई । उसने वहीं रखे चाकलेट को देखा और उसके बाद जेब से कलम निकाली और बालु पर ‘आई एम वेइटिङ् फर यु, आई विल कम ब्याक’ लिखा तथा एक मंद मुस्कान छोड़ते हुए फिर आऊँगा इस भावना के साथ घर वापस लौट गया ।
हर वर्ष २६ मई को विराट यहाँ जरूर आता है । आज से पन्द्रह वर्ष पहले वो हमेशा अपनी प्रेमिका के साथ आया करता था । वो दोनों बैंकाक पढ़ने के लिए आए थे । अध्ययन के क्रम में ही पहले साथी बने और बाद में प्रेमी-प्रेमिका । पढ़ाई में दोनों ही अव्वल थे । धीरे-धीरे प्रेम के विस्तार के साथ ही पढ़ाई के बाद विवाह के बन्धन में बंधने की योजना उन्होंने बनाई । दुबली-पतली कुसुम जब हँसती थी तो बहुत ही प्यारी लगती थी । हमेशा हँसते रहना उसकी आदत थी । अक्सर गरमी की शाम उनकी समन्दर के किनारे गुजरती थी । न जाने कितनी देर तक समन्दर के रेत में अपने पैरों को दबाए एक दूसरे की आँखों में डूबे रहते थे । उन्हें लगता उन आँखों के सिवा दुनिया में कोई भी चीज न तो खूबसूरत है और न ही प्रिय । अस्त होते सूरज को देखते हुए घंटो बीत जाते । घोसलों की ओर लौटते पक्षियों के पंखों के साथ उनके भी सपने उड़ा करते थे । अनमोल था वो पल जिन्दगी का सबसे खूबसूरत पल । उनका प्यार एक दूसरे के नशों में प्रेम का तरंग बन कर दौड़ता था । कम बोलना और हमेशा मुस्कुराना और शरमाना ऐसी ही थी कुसुम । न जाने कितनी बार विराट ने उसके हाथों को थामा था, पर हर बार जब वह उसके हाथों को अपने हाथों में लेता तो वह ऐसे ही शरमाती जैसे विराट ने पहली बार उसके हाथों को थामा है । उसका यह शरमाना उसे और भी खूबसूरत बना देता था और उसकी यही अदा विराट को उसका दीवाना बनाती थी । न जाने कितने पल विराट उसकी आँखों में डूब कर गुजार देता था । समन्दर के किनारे बैठकर जिन्दगी के सपने बुना करते थे, सपनों का महल बनाते थे, कहाँ किस चीज की कमी रह गई उस पर बातें करते थे । रेत पर ऊँगलियों से कुसुम चित्र बनाती और विराट उसे सजाता । सागर का यह किनारा उनके मिलने की जगह थी जहाँ उन्होंने एक दूसरे के प्रेम को समझा था जहाँ रेत पर हजारो बार एक दूसरे का नाम लिखा था और कई बार घरौंदे का निर्माण किया था जिसे तेज लहर बहा ले जाती थी । इसी बीच विराट को नेपाल आना पड़ा उसकी वृद्धा नानी उसे देखना चाहती थी । कुसुम की सहमति से ही वह घर आया कुसुम ने भारी मन से उसके वापस लौटने की तैयारी की थी । एयरपोर्ट तक उसे छोड़ने आई थी । एयर पोर्ट तक पहुँचने और भीतर जाने तक उन दोनों के बीच खामोशी छाई रही । कोई संवाद उनके बीच नहीं हुआ था । विराट चला गया ।
विराट के जाने के बाद रोती हुई कुसुम समन्दर के किनारे आई थी, जहाँ उसे लगा था कि खोखला और खाली है । आँखों से बहते आँसू को देखकर वह खुद अचम्भित थी । दिल के दर्द को भुलाने के लिए विराट के साथ गुजारे समय को याद कर मुस्कुरा उठी थी वह । वहाँ की भीड़ भी उसे शून्य नजर आ रहा था । खुद को बहलाने के लिए अकेली वो दूर तक निकल गई, फिर वापस आई पर आज उसे न तो वो रेत अपनी ओर खींच रहा था और न ही उसका सबसे प्रिय सागर तट उसे अपना लग रहा था । बस एक हताशा व्याप्त थी उसके चारो ओर जहाँ वह खुद को तनहा महसूस कर रही थी ।
विराट के साथ उसकी रोज फोन पर बातें होती थी पर उसके बिना होस्टल में एक पल भी उसे रहना गँवारा नहीं होता था और वो उससे मिलने भागी आती थी सागर के किनारे । विगत की बातों को याद कर एक हँसी फैल गई उसके होठों पर उसने अस्त होते सूरज की ओर देखा, एक लम्बी साँस ली और सोचा ओह कितना लम्बा दिन ।
१५ दिन विराट के बिना एक युग की तरह गुजरा और अंततः वह दिन आ ही गया जिस दिन विराट वापस आने वाला था । एक उमंग और स्फूर्ति उस पर छाई हुई थी । उसने विराट से सागर तट पर ही आने का आग्रह किया क्योंकि होस्टल में बहुत देर तक बैठ कर बातें नहीं की जा सकती थी । समय से पहले वह सागर तट पर आ गई । धूप ढलने लगी थी । गरम हवा अब थोड़ी-थोड़ी ठंडी होने लगी थी । सर्र-सर्र चलती हवा कुसुम के बालों को उड़ा रही थी कभ-(कभी तो कुसुम को लगा जैसे विराट उसके बालों को सहला रहा हो । १५ दिन तक विराट ने भी तो हृदय की कटुता सही थी । उसने भी इन पन्द्रह दिनों में यह महसूस किया था कि कुसुम के बगैर उसकी साँसे चलनी मुश्किल है । कितनी देर तक दोनों एक दूसरे को बाहों में थामे बैठे रहे । दोनों ही एक दूसरे से जुदा नहीं होना चाह रहे थे । हालत ऐसी थी मानों बहुत दिनों के प्यासे को पानी मिला हो । न जाने कितनी देर तक वो दोनों एक दूसरे को निहारते हुए खामोशी से बैठे रहे । समय गुजरता रहा पर वो एक दूजे में खोए रहे । विराट ने कुसुम को चाकलेट दिया । विराट जानता था कि कुसुम को कौन सी चाकलेट पसंद है इसलिए वो जब भी उससे मिलने आता तो उसकी पसंद के चाकलेट जरूर लाता था । उस शाम भी काफी दूर तक दोनों नंगे पैर रेत पर चलते रहे । बिछोह के पन्द्रह दिनों की जो बातें थी दोनों ने एक दूसरे से कही-सुनी और फिर अलग होने का मन नहीं होने के बाद भी एक दूसरे से अलग हुए । पन्द्रह दिनों की दूरी ने दोनों को और भी करीब ला दिया था ।
एक दिन किसी मित्र की शादी में दोनों चर्च गए । वहाँ उन्हें बहुत अच्छा लग रहा था । चर्च की शादी देखने का यह पहला अवसर था । नई रीति-रिवाज, पहनावा सब अलग सा । पादरी जो कह रहा था वह सब विराट कुसुम के कानों में कहता जा रहा था । खयालों की इस शादी में दोनों रमे हुए थे । उन्हें लगा जैसे उनकी शादी हो गई है । सभी चले गए थे पर वो दोनों वहीं रह गए और जीसस को साक्षी मान कर मन-ही-मन शादी कर ली । आत्मा के संगम से पवित्र कुछ नहीं होता । रातभर वो वहीं रहना चाहते थे पर यह सम्भव नहीं था । वो शाम उनके लिए अद्भुत था । मन था जो यह समझ रहा था कि वो नई जोड़ी हैं और यही वजह थी कि सारा बैंकाक शहर उन्हें दुल्हन की तरह लग रहा था । मौसम भी मेहरबान था । हल्की बारिश हो रही थी । दोनों ही पैदल हाथों में हाथ डाले पानी में भीगते होस्टल की तरफ चल दिए । बारिश की बूँदे फूलों की बारिश लग रही थी । न चाहते हुए भी उन्हें अलग होना पड़ा । इसी तरह उनके समय गुजर रहे थे ।
परीक्षा समाप्त हो गई थी । इसी बीच कुसुम के घरवालों ने उसे नेपाल बुलाया परन्तु पढाई अब भी एक साल बाकी थी इसलिए कुसुम ने अपने घरवालों को कहा कि यह साल बहुत महत्त्वपूर्ण है इसलिए वह अभी नेपाल नहीं आ सकती । परिवार वालों ने भी इस बात को समझा और वो खुद बैंकाक चले आए कुसुम से मिलने । कुसुम ने उनका परिचय विराट से कराया कहा कि, विराट उसका बहुत ही अच्छा और सच्चा मित्र है । पर अपने प्रेम और शादी की बात उसने नहीं बताया । वो चाहती थी कि ये बातें पढाई समाप्त होने के बाद सब को पता चले । दोनों दिन-रात एक कर अपनी पढाई कर रहे थे क्योंकि इस पर ही उनका सुन्दर भविष्य टिका हुआ था । विराट को देखकर यह नहीं लगता था कि वह पढाई में बहुत अच्छा होगा । परन्तु उसका रिजल्ट हमेशा अच्छा होता था । अपने दोस्तों में वह अच्छा खासा चर्चित था ।
और फिर वह दिन भी आया जब दोनों की परीक्षा समाप्त हुई और उन्हें अब नेपाल वापस आना था । दोनों की आँखों में एक ही सपना, एक ही चेहरा और एक ही कल्पना थी । भविष्य के मीठे-मीठे सपने आँखों में पल रहे थे । चाहत के पंख लगे हुए थे । बैंकाक सिर्फ एक शहर नहीं था बल्कि उनके लिए वो जगह थी जिसने उन्हें मिलाया था, जहाँ उनके सपनों ने परवाज भरे थे इसलिए वो बैंकाक नहीं छोड़ना चाहते थे । अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि उन्हें वहीं रहना है इसलिए विराट नौकरी की खोज में लग गया और कुसुम अपने माता-पिता की जिद पर शादी की तैयारी के लिए नेपाल वापस चली गई । एक साथ रहने का वादा कर कुसुम को विराट ने ढेर सारा चाकलेट देकर विदा किया । कुसुम नेपाल चली गई । पर कुसुम के लिए वहाँ अकेले करना मुश्किल हो रहा था । विराट को याद कर हमेशा उसकी आँखें बरसती रहती थीं । उसे लगता वो उड़कर विराट के पास चली जाए उसकी बाँहों में समा जाए । कुसुम ने अपने घरवालों से विराट के विषय में बताया । परिवार वाले मान गए और खुशी-खुशी उनदोनों की शादी के दिन का इंतजार करने लगे । इस बीच विराट ने बैंकाक में नया फ्लैट ले लिया था । शादी को एक महीना बाकी था । इसलिए कुसुम ने अपने परिवारों से कहा कि वो एक बार बैंकाक जाकर सारी व्यवस्था करना चाहती हैं । परिवारवाले भी इस बात के लिए मना नही कर पाए क्योंकि वो जानते थे कि दोनों को वहीं रहना है तो इसमें रोकना क्यों ? विराट को खबर कर दी गई कि २६ मई का कुसुम का टिकट है । दोनों एक दूसरे से मिलने के लिए बेताब थे । लगता था कि कब मुलाकात हो जाए । बेसब्री से दोनों २६ मई का इंतजार कर रहे थे । यह दिन विशेष हो गया था दोनों के लिए ।
और दिनों की अपेक्षा उस दिन जल्दी ही उठकर विराट तैयार हो गया था । बार-बार खुद को आइना में देख रहा था फिर बिना कुछ खाए-पिए वो सागर तट की ओर चल पड़ा परन्तु चाकलेट ले जाना वह नहीं भूला । उसके होठों पर लगातार मुस्कुराहट थी और नजरें घड़ी पर । मन बहलाने के लिए रेत के घर बनाने में खुद को व्यस्त किया, कभी पानी में पत्थर फेका तो कभी सोचा कि क्यों ना छिप जाऊँ और कुसुम को परेशान करुँ । समय बीतता रहा, धूप तेज हो रही थी । बेंच पर छाता ओढ़कर विराट कुसुम का इंतजार करता रहा पर कुसुम नहीं आई । वो वहाँ से कुसुम के बिना उठना नहीं चाह रहा था । दिन गुजरा, शाम हुई, लोगों की भीड़ कम होने लगी वातावरण में सिर्फ लहरों की आवाज थी । बार-बार उसे कुसुम की याद आ रही थी उसने अंतिम बार कहा था कि मैं वहीं तुमसे मिलने आऊँगी इसलिए विराट वहाँ से उठना नहीं चाह रहा था । कभी तो उसे लगता कि कहीं कुसुम छिप कर उसे सता तो नहीं रही पर कुसुम कहीं नहीं थी । वो वहीं बैठा रहा कि कुसुम यहाँ जरुर आएगी । मन में कई शंका उठ रहे थे पर वो उसे अपने मन में जमने नहीं दे रहा था । बस उसे यह यकीन था कि उसकी कुसुम उसके पास जरुर आएगी । सोचते-सोचते उसकी आँख लग गई । सुबह उसे खोजते हुए उसके दोस्त आए और उसे कहा कि कुसुम जिस प्लेन में आ रही थी वो क्रैश हो गया जिसमें कुसुम की भी मौत हो गई है । इससे अधिक वह कुछ सुन नहीं सका और बेहोश हो गया । जब होश आया तब वह अस्पताल में था । पर वह बेहोश ही रहना चाहता था । उसे यह उजाला सहन नहीं हो रहा था । उसे यकीन नहीं हो रहा था कि कुसुम उसकी जिन्दगी से कहीं दूर जा चुकी है, कि अब उसे उसका साथ कभी नहीं मिलेगा । उसे अब भी लगता था कि कुसुम आएगी, वो उसे छोड़ कर जा ही नहीं सकती । किन्तु यही तो जिन्दगी है जहाँ कल क्या होगा यह कोई नहीं कह सकता है । सपने कहाँ सच होते हैं उसे तो टूटना ही होता है । सभी के जीवन में पूर्णिमा हो यह जरुरी तो नहीं । जिन्दा तो वह था, पर विराट खो गया था । न तो अब उसके होठों पर वो शरारती हँसी होती थी, न ही उसकी वो मुखरता जिसकी वजह से वह दोस्तों में प्रिय था ।
सब कुछ वही था । वही लहरें, वही किनारा, वही भीड़ परन्तु विराट अकेला था । उसने जाना कि समय किसी का नहीं होता और न ही किसी का इंतजार करता है । कई बार उसके दिल में खयाल आया कि वो उसी सागर की गहराई में खो जाए पर ऐसा कर नहीं पाया । सागर तट पर बार-बार कुसुम को पुकारता, उसे खोजता विराट हर रोज वहाँ आता था । परीक्षा का परिणम आया । कुसुम प्रथम हुई थी और वह द्वितीय । उसने सागर तट पर जाकर यह खबर कुसुम को सुनाई थी । अपनी खुशी उसके साथ बाँटी थी ।
वक्त गुजरा । विराट नेपाल नहीं लौटा । वो बैंकाक में ही बस गया क्योंकि उसे यकीन था कि कुसुम वहीं है और एक दिन जरुर आएगी । इसी बीच उसकी शादी इभा से हो गई । उसने इभा को भी यही कहा कि उसे कुसुम का इंतजार है । इभा ने कहा था-‘ठीक है अगर कुसुम तुम्हें नहीं मिली तो मैं उसे लाकर दूँगी ।’ विराट के व्यक्तित्व ने इभा को उसके करीब ला दिया था । वह उसे सम्भालना चाहती थी । उसने कभी भी विराट से उसके अतीत के विषय में नहीं पूछा और हमेशा उसका खयाल रहा ।
पहले तो विराट हमेशा सागर तट पर आया करता था । घंटो वहाँ बैठकर कुसुम का इंतजार करता । परन्तु धीरे-धीरे दिन सप्ताह में और सप्ताह महीनों में बदलते चले गए । किन्तु बीते पन्द्रह वर्षों में उसने २६ मई को वहाँ आना नहीं छोड़ा था । वो रात उसकी सागर किनारे गुजरती रही ।
आज उसका १२ बर्ष का बेटा है, प्यार करने वाली पत्नी है । एक सुखी परिवार है । यह कह सकते हैं पर उसके दिल से कभी कुसुम नहीं निकली । कई बार वो इभा को कुसुम कह कर पुकार बैठता था । अंतरंग क्षणों में भी उसके दिलो दिमाग में कुसुम ही होती थी । पर कभी इभा ने इसकी शिकायत नहीं की । वो जानता था कि इभा के साथ यह अन्याय है पर वो स्वयं को विवश महसूस करता रहा । प्यार किसी से और जिन्दगी किसी और के साथ जुड़ गर्ई थी । बाहर से शांत दिखने वाला विराट हमेशा विचलित रहता था । वो बस एक दिन जीता था बाकी के दिन वो स्वयं को मरा हुआ महसूस करता था । विगत १५ बर्षों से वह प्रत्येक मई २६ को चाकलेट लेकर वो सागर किनारे आता था । इंतजार और खुद से बातें साथ ही लहरों की शीतलता का अनुभव करता हुआ अपना समय व्यतीत करता था । क्योंकि यही तो वह जगह थी जो प्रेम की साक्षी थी, उसके वादों की, यादों की और फिर एक लम्बे बिछोह की भी । उस दिन उसे लगता कि उसकी कुसुम उसके साथ है । घर के लोग नहीं जानते थे कि वो हर २६ मई को कहाँ जाता है । विराट जी रहा था उस झूठी आशा के साथ कि कुसुम आएगी । यही झूठी उम्मीद उसे जिन्दा रखे हुए थी वरना तो वो कब का मर चुका होता । हर २७ मई की सुबह वो सागर तट से वापस होता था खुद से इस वादे के साथ कि वो फिर आएगा अगले २६ मई को अपनी कुसुम से मिलने और ढेर सारी बातें करने । उसके जीने की वजह बन गया था २६ मई जिसकी प्रतीक्षा में वह अपनी जिन्दगी गुजार रहा था ।

(चौधरी स्थापित कवि हैँ । उन की डेढ दर्जन अधिक कृतियां प्रकाशित हैँ ।)
[email protected]