• २०७९ असोज १८ मङ्गलबार

हिमालय की टीस

ध्रुव जोशी

ध्रुव जोशी

एक दिन मैने हिमालय से कहा
ए उतुङ्ग धवल शिखर अति सुन्दर
फैला है निरव बर्फ का समन्दर
चारों ओर पसरा है सुकुन भरा सन्नाटा
मिहिर मयूख उडेलती है स्वर्णिम छटा
वैजयन्त का देता है नशा ।

मुग्ध होता है मन देख कर यह मञ्जर
वाणी परोस नहीं सकती इस तिलिस्म को
आँखे तृप्त होती है निहार कर
यह रूहानी छवि मनोहर ।

श्वेत चादर ओढे सर्वोच्च शिखर के नीचे आकर
दिगन्त विजयी भी बौना बन जाता है
बडा वही कहलाता है
जो ऊँचा सब से दिखता है ।

हिमालय पहले तो खुश हुआ
फिर न जाने क्यो उदास हो कर बोला
मेरी नियति यहाँ खडा रहना है दीवार के तरह
मौत की तरह ठंडी बर्फ ओढे
निरवस्त्र बाह्रो मास
न बीज कोई उगता है यहाँ न पनपते पेंड पौधे
बर्फ की इस बाँझ खेत में न कभी जमती है हरी घाँस
लोग सिर्फ मेरी ऊँचाई को नापते है
अन्तरमन में नहीं झाँकते
बुलन्दी इतनी है मेरी
मै झुक नहीं सकता
चाह कर भी किसी से मैं सिजदा नहीं कर सकता
एकाकीपन मेरे अन्दर और भी गहराता है
मेरा अस्तित्व फकत दीवार बन कर रह जाता है ।


(जोशी पेशा से कृषि वैज्ञानिक हैँ, वे पत्रकारिता के साथसाथ साहित्य सिर्जना भी करते हैं ।)
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