• २०७९ असोज १६ आइतबार

लघुकथा-हिन्दी

डॉ. मुक्ता

डॉ. मुक्ता

चांद अपनी ससुराल में रहता था और रात-दिन अपनी सासू मां की सेवा करता था । वह उसे अपनी वफ़ा का विश्वास दिलाते नहीं अघाता था । एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा, ‘चलो हम अपना कुछ काम शुरू करते हैं । मां से कहो…एक दुकान खुलवा दें । ‘उसने अपनी मां से सब कुछ कह दिया।

मां ने पलट कर कहा-‘बेटी ! मुझे तो इस शैतान पर तनिक भी भरोसा नहीं  है और मैं तो उसे एक पैसा भी नहीं देने वाली । तनिक, सोचो ! जिस मां ने उसे जन्म दिया; उसका पालन-पोषण किया । जब वह उसका ही न हो सका और वह उसे वहां छोड़ चला आया । वह तुम्हारा कैसे हो सकेगा ?’
‘तुम चांद पर भरोसा कभी मत करना । वह तो स्वार्थी है…निपट स्वार्थों । जिसने कभी अपनी विधवा मां की ओर पलट कर नहीं देखा, वह तुम्हें क्या पूछेगा ? वह तो कलंक है मानव समाज पर । तुम उसे यूं ही चाकरी करने दो । वह इसी योग्य है ।’
यह सब सुनते ही बेटी का स्वाभिमान जाग उठा । उसने चांद से अपने घर चलने को कहा और उससे ग़ुहार लगायी, कि अब वे यहां पर एक पल भी नहीं रहेंगे और वह पति के साथ खुशी-खुशी अपने घर की ओर चल पड़ी ।वह अभागिन मां अपने पुत्र व पुत्रवधु को देख विश्वास नहीं कर पाई, क्योंकि वह तो कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि उसके जीवन में कभी खुशियां लौट भी सकती हैं । परंंतु सुबह का भूला, यदि शाम को घर लौट आये, तो वह भूला नहीं कहलाता ।


(वरिष्ठ लेखिका,हिन्दी अकादमी हरियाणा की पूर्व निदेशक गुडगाँव, हरियाणा, भारत)
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